रविवार, 24 अप्रैल 2011

रामदीन की कविता - भांग पड़ी ठंडाई

‘‘अर्थ सत्‍य''

भांग पड़ी ठंडाई

अबकी होली बड़ी अजब थी सुन लो मेरे भाई

धरती माता से मिलने को चांद ने ''' दौड़ लगाई

 

होगा बड़ा मंगल जग में गाल बजायें पोंगा पंथी

धरती पर कोहराम मचेगा ऐसी पोथी बांचे ग्रंथी

 

पर मैं सोचूं धरा को रंगने चांद ने दौड़ लगाई

बूढ़े काका ने पी डाली भांग पड़ी ठंड़ाई, देखो भांग पड़ी ठंड़ाई

 

काकी की सलवार पहन ली समझ पजामा अपना

करते हरकत बच्‍चे जैसी जग हो जैसे सपना

 

समझ के चोटी काकी जी की भैंस पूंछ सहलाई,

बूढ़े काका ने पी डाली भांग पड़ी ठंड़ाई,

 

प्‍यारी किस बात पे प्रिय रूठी हो करी नहीं जो चोटी दो

ऐसी हालत देख काका की भैंस रही पगुराई

बूढ़े काका ने पी डाली भांग पड़ी ठंड़ाई, देखो भांग पड़ी ठंड़ाई

 

छप्‍पन भोग लगायें श्रीमन फूला खूब पलास

फिर भी एक गुझिया को तरसे भोला खड़ा उदास

 

महलों और चौबारों में फिर खूब सजी रंगोली

नत्‍था बीने गली में कचरा लिए पुरानी झोली

बूढ़े काका ने पी डाली भांग पड़ी ठंड़ाई, देखो भांग पड़ी ठंड़ाई।

--

 

''' दौड़- होली की पूर्णिमा पर चांद 36000 कि0मी0 पृथ्‍वी के और निकट आया गया था।

इस होली में.........

---

 

-रामदीन, जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी

कृष्‍णा नगर, कानपुर रोड, लखनऊ

3 blogger-facebook:

  1. भरी दोपहरी रामदीन ने फिर से भांग छनाई
    जय हो होली का त्योहार, ऐसी कविता पाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. भांग का नशा सुरूर लेने लगा .....
    ....पिने वाला मस्तियाने लगा ..........

    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  3. अति उत्तम ,अति सुन्दर और ज्ञान वर्धक है आपका ब्लाग
    बस कमी यही रह गई की आप का ब्लॉग पे मैं पहले क्यों नहीं आया अपने बहुत सार्धक पोस्ट की है इस के लिए अप्प धन्यवाद् के अधिकारी है
    और ह़ा आपसे अनुरोध है की कभी हमारे जेसे ब्लागेर को भी अपने मतों और अपने विचारो से अवगत करवाए और आप मेरे ब्लाग के लिए अपना कीमती वक़त निकले
    दिनेश पारीक
    http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------