पुरूषोत्तम व्यास की कविता - भूले से

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भूले से

आई ही जाती हँसी

उसको देखा पथ पर

मेरे तरफ उसकी नजरें

मुड़ी थी

अब आई

कविता में ।

 

एकांत

क्या क्या

विचार ले आता

छोटा सा घरौंदा

उस नन्हें नन्हें

चोंच वाले पक्षियों का

मुझे लगा उसने

बहुत सी बातें कही

प्यार 

संभलकर हर शब्द लिखना

जो ह्दय के एहसासों को

परिपूर्ण कर सके

कितने दिवस बाद अब समझा

कितना नासमझ ।

 

ये कैसी बात

पूरी या अधूरी

पिघलते हिमशिखर

अभी भी मेरा विश्वास

अभी भी पथ मे खड़ी हैं

जीवन सांसें

तारे

चमचमाते

कितने

शब्द ह्दय मे समाहित

कर गई

 

सुना वह कविता लिखती

इसलिये उसकी आंखों का प्यार

उमड़ पडा कविता में

बंधन फिर भी

डूब ही गया

नही तैरता रहता

उन एहसासों में

कहने को

सुनने को

बहुत कुछ होता

किसे क्या मालूम

कि

उसके

आंखों में

भूले से ही सही

पर

हँसी आती मुझे अपने आप पर

वह मुझे प्यार करती थी

पर मैं

नासमझ ......।

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1 टिप्पणी "पुरूषोत्तम व्यास की कविता - भूले से"

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