मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा की कविताएँ

सार्वजनिक परिसर और स्‍वच्‍छता

सुलभ इंटरनेशनल

सार्वजनिक परिसर में आपका स्‍वागत है,

आप इस परिसर के मेजबान-मेहमान, अभ्‍यागत हैं,

परम आदरणीय, आपका हार्दिक अभिनंदन है।

सम्‍माननीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों...

सेवाएं प्रदान करने वालों एवं सेवाएं प्राप्‍त करने वालों...

संभ्रांत नागरिक, बन्‍धुओं, भाईयों, बहनों, नेताओं, नेत्रियों...

कृपया सार्वजनिक परिसर को साफ, स्‍वच्‍छ, स्‍वस्‍थ रखें...

ताकि सारी दुनिया आपके परिसर पर नाज कर सके।

 

क्‍योंकि आप सब माँ भारती के लाड़ले हैं, नंदन हैं।

आशय आप समझ ही गये होंगे,

पान, गुटका, गुड़ाखू, बीड़ी, सिगरेट और तम्‍बाखू...

शराब और खाली बोतलें, ढेरों पाऊच...

खा पीकर, यत्र तत्र परिसर के अंदर और बाहर,

सीढ़ियों के दायें-बायें, दीवालों पर, खिड़कियों में,

शौचालयों, मूत्रालयों में खुले स्‍थानों पर,

टेबिल कुर्सियों के नीचे, डस्‍टबीन में, गमलों पर...

खीसें निपोरकर, खॅखारकर थूक देने वालों,

मन के दास, गुलाम, चाकर, साखू और बैसाखू...

कृपया सार्वजनिक परिसर को साफ, स्‍वच्‍छ, स्‍वस्‍थ रखें...

हाथ जोड़कर अनुरोध, विनती एवं चरण वंदन है।

 

डरें नही, मैं आपको खाने के लिए मना नही कर रहा हॅूं।

मेरा कहा आप मानेंगे भी नही, अपने धुन के पक्‍के जो हैं।

आप खून पसीने की कमाई से कम बनाम झटक कर,

खाने पीने में ज्‍यादा विश्‍वास और भरोसा जो करते हैं।

बच्‍चों का पेट काट, पत्‍नी की साड़ी छीन, कर्मठता के साथ...

पान, गुटका के उद्योगों और पान ठेलों को आप ही तो पोसते हैं।

 

कोई भला मानस आप को समझाये, बुझाये, मना करे...

तो आप उन्‍हें भला बुरा कहते, लल्‍लू कहते और कोसते हैं...

आप को जो समझ में आता है, जो करना है, वह करें,

मगर मैं आपका ध्‍यान इस ओर आकृष्‍ट करना चाहता हॅूं

कि सारी जनता सार्वजनिक परिसर में ही आकर क्‍यों थूकती है?

कृपया सार्वजनिक परिसर को साफ, स्‍वच्‍छ, स्‍वस्‍थ रखें...

महानुभावों के आगे एक धड़कते हुए दिल का ये स्‍पंदन है।

 

सुनिये, भाई साहब मुझे कदाचित्‌ मतलब नही है,

आपके हथेलियों, मॅुंह के छालों और सड़ते दातों से,

कैंसर के खतरे, मौत के मुहाने में जाते आपकी आंतों से,

क्‍योंकि आप शेखी बघारते, दहाड़ते हुए...यही कहेंगे,

हमें कुछ लेना देना नहीं ऐसी बेफजूल की बातों से,

क्‍या आपको नही दिखाई देता यहां का भयानक दृश्‍य।

दिमागी खोखलेपन का ये क्रूर, घिनौना, वीभत्‍स परिदृश्‍य।

निःसंदेह आप भी देखते हैं, पर पुनः उस पर थूंक देते हैं।

आपको क्‍या कि भले मानस, सुन्‍दरता, स्‍वच्‍छता को तरसते हैं।

आपकी करनी का फल ये लोग चुपचाप सहन करते हैं।

कृपया सार्वजनिक परिसर को साफ, स्‍वच्‍छ, स्‍वस्‍थ रखें...

कुछ तो रहम करो मित्रों! ये पीड़ित जनों का क्रंदन है।

 

आप लोगों से एक बात और कहनी है,

आप लोग सार्वजनिक परिसर के तमाम चीजों को,

उखाड़ फेंकते हैं, या ले जाकर बेच देते हैं या...

यदि आपको चीजें उखाड़ने का इतना ही शौक है,

तो जाइये नक्‍सलियों, आतंकियों के पांव उखाड़िये।

नषापान, बेईमानी, बुरे खयालात को जड़ से उखाड़िये।

मूत्रालयों, शौचालयों के नल, पाईप सिटकिनियां तो मानों,

आपको आमंत्रित करते हैं, कि आईये श्रीमान्‌ हमें उखाड़िये

और आप सधे सधे कदमों से चल देते हैं उस ओर...

चन्‍द सिक्‍कों की खनक पर अपनी सुविधाओं को बेच देते हैं।

क्षमा करें मित्रों ये अच्‍छी संस्‍कृति और अच्‍छी सभ्‍यता नही है।

कृपया सार्वजनिक परिसर को साफ, स्‍वच्‍छ, स्‍वस्‍थ रखें...

महोदय मानो तो सुविधायें हम सभी के लिये चंदन हैं।

 

बस स्‍टैण्‍ड के शौचालयों, मूत्रालयों, प्रतीक्षालयों में,

रेल्‍वे स्‍टेशन की पटरियां देख उल्‍टियां होने लगती है।

सार्वजनिक चिकित्‍सालय जहां मतदाता का ईलाज होता है।

नदी, तालाबों के घाट, सार्वजनिक कुओं, नलों के आस-पास,

किसी शैतान की रचना एवं नरक की यात्रा लगती है।

गाड़ियों में, बसों में, ट्रेनों में, मेलों में कचरों का भंडार।

गली-कूचों, सड़कों पर, होटलों में गंदगी का संसार।

दिल पे रखकर हाथ कहिये, क्‍या ये बढ़िया हिन्‍दुतान है ?

अगर नही, तो कृपया इस समस्‍या का हल सुझाइये,

वरना, कहते तो हम भी हैं, कि मेरा भारत महान है।

स्‍वास्‍थ्‍य पर अस्‍वच्‍छता का बुरा असर पड़ ही जाता है।

लाख छुपायें चेहरा, सैलानियों को पता चल ही जाता है।

कृपया सार्वजनिक परिसर को साफ, स्‍वच्‍छ, स्‍वस्‍थ रखें...

है हमारी परम्‍परा, सुबह-सुबह धरती मां का करते हम वंदन हैं।

 

 

कला नही जागीर किसी की, ये तो रब की मर्जी है।

किसको कितनी चादर दे-दे, वह एक ऐसा दर्जी है।

 

विस्‍तारित है यहां जगत, ओर नही कोई छोर नही,

कूप मंडूक-सा टर्राता आदमी, ओ महज फर्जी है।

 

शब्‍द चुरा लेने भर से कोई रचनाकार नही बनता,

कालजयी रचना जो रचते, बंकिम चन्‍द्र चटर्जी हैं।

 

गरजा हैं वो बरसा नही, बातें सबको है मालूम,

उमड़-घुमड़ कर आते बादल, वह केवल खुदगर्जी है।

 

नीव का पत्‍थर नीव बना, तब वैभव श्रृंगार हुआ,

अनुभव को न तिरस्‍कृत करना ,बस इतनी सी अर्जी है।

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