सोमवार, 4 अप्रैल 2011

कृष्‍ण विहारी लाल पांडेय एक व्यंग्य गीत - नदी के खास वंशज

घाट पर बैठे हुए हैं जो सुरक्षित

लिख रहे वे नदी की अन्‍तर्कथाएँ ।

आचमन तक के लिये उतरे नहीं जो

कह रहे वे खास वंशज हैं नदी के ।

बोलना भी अभी सीखा है जिन्‍होंने

बन गए वे प्रवक्‍ता पूरी सदी के ॥

पर जिन्‍होंने शब्‍द साधे कर रहे वे

दो मिनट कुछ बोलने की प्रार्थनाएँ।.....घाट पर बैठे....

 

थी जरा सी चाह ऐसा भी नहीं था

आँख छोटी स्‍वप्‍न कुछ ज्‍यादा बड़े थे।

बस यही चाहा कि सुख आये वहां भी

जिस जगह हम आप सब पीछे खड़े थे॥

दूर तक दिखते नहीं है आगमन पर

क्‍या करें मिटती नहीं ये प्रतीक्षाएँ ।.....घाट पर बैठे....

 

पुरातत्‍व विवेचना में व्‍यस्‍त हैं वे

उँगलियों से हटा कर दो इंच माटी।

हो रहे ऐसे पुरस्‍कृत गर्व से वे

खोज ली जैसे उन्‍होने सिन्‍धु घाटी॥

बन्‍धु ऐसे जड़ समय में किस तरह हम

बचा कर जीवित रखें संवेदनाएँ। .....घाट पर बैठे....

 

सब तरह आनन्‍द है राजी खुशी है

हम सभी आजाद है जकड़े नियम में।

तैरती है झिलमिलाते रंग वाली

मछलियाँ ज्‍यों काँच के एक्वेरियम में॥

सिर्फ पानी बदलता रहता हमारा

नही बदली हैं अभी तक विवशताएँ।

घाट पर बैठे हुए हैं जो सुरक्षित

लिख रहे वे नदी की अन्‍तर्कथाएँ ।

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डॉ0 कृष्‍ण विहारी लाल पांडेय

उम्र

लगभग चौहत्‍तर साल

प्रकाशन

दो कविता संग्रह

सम्‍प्रति

स्‍नातकोत्‍तर महाविद्यालय से प्राध्‍यापक से सेवा निवृत्‍त

सम्‍पर्क

70, हाथीखाना दतिया मध्‍यप्रदेश 475661

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