मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

देवी नागरानी की पुस्तक समीक्षा - कथ्य और शिल्प की आश्चर्य जनक विविधता "इस शहर में"

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शायरी सिर्फ़ सोच की ही उपज नहीं. वेदना की गहन अनुभूति के पलों में जब शब्द रचनाकार शिल्पी बनकर अपनी रचना को तराशते हैं तो उनके लिखे शब्दों का शब्दार्थ धड़कने लगता है. सोच की शिला में जान सी पड़ जाती है. और जब रचनाकार की रचनात्मक ऊर्जा की परिधियों में संवेदना का संचार होता है तब कहीं जाकर वह अंदर की दुनिया को बाहर की दुनिया से जोड़ पाता है.

इसी कार्य को सफलता पूर्वक अंजाम दिया है श्री रमेश प्रसून जी ने जिनका ग़ज़ल-संग्रह 'इस शहर में' अपनी प्रतिनिधि रचनाओं द्वारा गुफ़्तार करता हुआ हमसे रूबरू हुआ है.

कह गयी बहती नदी तालाब से

जो भी ठहरा है सड़ा है, सोच लो

उनके इस शेर के प्रस्तुतीकरण की अदाइगी कुछ यूं सामने आई है की पहला मिसरा सुनने वाला, दूसरे मिसरे के लिए उत्कंठित हो उठता है और उसे सुनते ही अनायास वाह! कह बैठता है. एक और बेशकीमती शेर की नागीनेदारी भी देखिये:

रहन जैसे रखी साँस पर साँस हो

क़र्ज़ पर क़र्ज़-सी ली गई ज़िन्दगी

ज़िन्दगी की राहों पर तजुर्बात के गलियारे से गुज़रकर इंसान हक़ीक़तों से मिलता है, जुड़ता है और भोगता है. समकालीन हिंदी ग़ज़ल सिर्फ़ काल्पनिक अभिव्यक्ति ही नहीं बल्कि यथार्थ बनकर आदमी की ज़िन्दगी की समस्याओं से खुद को जोड़ती है. जीवन की जटिलताएं और विसंगतियां कई स्वरुप धारण करके कभी खुद को समाज से जोड़ती हैं, तो उसकी जटिलताओं से, तो कभी ममता के उस शजर से, तो कभी आस-पास के लहलहाते कुदरती नज़ारों से. श्री रमेश जी की इस बानगी को सुनिए, और गौर कीजिए कि कितनी सशक्तता से वे अपनी सोच को शब्दों में सजा रहे हैं---

ठिठुरी रातों ने ओढ़े हैं जबसे गुठे लिहाफ़ जी

जाड़ा समझा हो गई वो रातें मेरे ख़िलाफ़ जी

मौसम की वेदनाएं बखूबी वर्णन करते हुए कलमकार अपने अंतर्मन के भावों को प्रकृति से किस क़दर जोड़ पाया है, उसका ज़ायका लेते हुए आप महसूस करें--

आंधियां ही आंधियां थीं आंधियों के सामने

कुछ लचीले वृक्ष ही डट कर खड़े होते रहे

हिल गया होगा वही विश्वास मन का इसलिए

एक लौ बुझने से पहले देर तक कांपी बहुत

आग लगनी लाज़मी है, फूस का यह ढेर अब

कान चिंगारी के कुछ भरने लगा है क्या करूँ?

मानव मन की संवेदनशीलता, कोमलता और भावनात्मक उद्गारों की कथा-व्यथा को इन शेरों में श्री रमेश प्रसून जी ने एक नया आयाम प्रेषित किया है, ऐसे जैसे उन्होंने ज़िन्दगी के महाभारत को लगातार जाना है, लड़ा है, और शब्दों की शिल्पकृतियों के माध्यम से अपने जद्दो-जहद को व्यक्त किया है. प्रस्तुत है उनकी कलाकृति उनके शब्दों में----

शहर अब और सह पाएगा

बदनुमा दाग़-दागदारों को

किस तरह निकलूँ भला बेदाग़ जब हर ओर से

दागदारी हाथ छूने को मुझे बेताब है

मान्यता प्रधान है, रिश्तों की महत्वता मान्यता से है. आजकल के दौर में अपनेपन की नज़दीकियों में फ़ासले बढ़ रहे हैं. अपनाइयत गैरतों का जामा ओढ़कर सामने आ रही है. स्वार्थ का बोलबाला विश्वास के रिश्तों को खोखला करता जा रहा है.जिस ममता की छांव का आंचल सदियों से शादाबियाँ बख़्शता आया है, आज वही सहारा ठूंठ बनकर सूनेपन में निहारता रहता है. कोहरे के इस धुंध को गहरा होने से बचाना है. इस पीड़ा की अभिव्यक्ति इन निमः लिखित शेरों में टटोल कर देखिये---

सींच रही है कह नहीं पायीं उस माँ की बूढ़ी आँखें

ऐसे बेटे से अच्छा था बेटा अगर नहीं होता

है फटा आँचल मगर वह बेखबर है

माँ है, शायद सिर्फ़ बच्चों पर नज़र है

इसी पीड़ा की शिद्दत को महसूस करते-करते रमेश प्रसून जी ने मन के गहरे भावों को सरल सटीक शब्दों में सरलता से बोलचाल की भाषा में प्रस्तुत किया है. यही उनकी लेखनी की एवं प्रतिभाशाली क्षमताओं का प्रमाण है जो उनकी भावनात्मक सोच शब्दों में ढलकर आम जनता के दिलों को टटोलने में, उन्हें दस्तक देने में, और छूने लेने में सक्षम है. ग़ज़ल में कथ्य और शिल्प की आश्चर्य जनक विविधता तो है ही, साथ में कलात्मक कसावट एवं बुनावट भी पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचती है. उनके इस साहित्य के सफ़र के लिए और साथ में इस अनुपम कृति के लिए अनेकों शुभकामनाएं.

देवी नागरानी

dnangrani@gmail.com

ग़ज़ल संग्रह: इस शहर में, ग़ज़लकार: श्री रमेश प्रसून, पन्ने: १३६ , मूल्य: रु.१५० , प्रकाशक: अमित प्रकाशन, कविनगर, गाज़ियाबाद २०१००२

3 blogger-facebook:

  1. शानदार गज़ल संग्रह है और उतनी ही शानदार समीक्षा।

    उत्तर देंहटाएं
  2. Vandana ji
    aapka bhaar is tippni ke liye. Protasahan barkarar rahta hai
    shubhkamnaon ke saath

    उत्तर देंहटाएं
  3. Vandana ji
    Is protsahjanak tippni ke liye bahut bahut dhanywaad.
    shubhkamnaon sahit

    उत्तर देंहटाएं

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