सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की लघुकथा - मनी प्लांट

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सुबह अभी खुलकर नहीं हुई थी। उजाले ने अभी केवल अंगड़ाई ही ली थी। गुलाबी जाडे का मौसम था। नमन जी ब्रश करते हुए अपने मकान के लॉन तक चले आए। उनके घर के बगल में ही मि. रमन जी का घर था। नमन जी ने देखा कि रमन जी का मनी प्लांट पौधा काफी हरा भरा हो गया है। संयोग से उसी समय रमन जी दिखायी पड़ गए। नमस्कार की औपचरिकता पूरी हुई तो नमन जी ने रमन जी से पूछा, "अरे भाई, आपका मनी प्लांट तो काफी बड़ा हो गया जबकि मेरा तो वैसे का वैसा ही पड़ा है। मुझे याद है कि हम दोनों ने इसे एक साथ लगाया था। आखिर ये चमत्कार क्या है? रमन जी ने हिकारत भरी नज़र से नमन जी के प्लांट को देखा और मुस्कुराते हुए बोले-" अरे कुछ केयर भी करते हो या बस यूं ही ...." उन्होंने वाक्य को बीच में कुछ ऐसे छोड़ा जैसे कोई अपनी गाड़ी न्यूट्रल गेयर में डाल कर चलता छोड़ दे।

"अरे भाई खाद डालता हूँ, पानी डालता हूँ और धूप हवा तो वैसे ही मिल रही है और क्या चाहिए पेड़ के लिए।’ नमन जी असमंजस की स्थिति में बोले।

"कौन सी खाद डाली है।’ पूछा रमन जी ने ।

"अरे वही जो सब डालते है।’ रमन जी का जवाब था ।

"यही तो गड़बड़ है न । अरे भाई यह मनी प्लांट है , इसमें साधारण खाद काम नहीं करेगी । इसमें डालो चरित्र की खाद और चरित्र जितना सड़ा होगा उतनी बढ़िया खाद होगी । फिर देखो तुम्हारा मनी प्लांट भी कितनी तेजी से बढ़ता है । और ये ताज़ा हवा पानी सब बेकार है,थोडी सी रिश्वत की हवा दो, ग़रीबों के हिस्से की धूप खिलाओ तब देखो तुम्हारा मनी प्लांट कैसे खिलता है ।मगर सुनो यार ये सब राज़ की बातें हैं,किसी से बताना नहीं ।’ रमन के मुख पर कुटिल मुस्कान थी और नमन जी की आँखें आश्चर्य से चौडी हो गयी ।

 

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सम्प्रति :- मण्डल रेल प्रबन्धक कार्यालय, इलाहाबाद

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव

५/२ए रामानन्द नगर

अल्लापुर, इलाहाबाद

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