सुमित शर्मा की ग़ज़ल

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ग़ज़ल

अब शाहों का सिंहासन, जल्‍दी थर्राने वाला है,

मिजाजे आम हैं बिगड़ा, बवंडर आने वाला है।

 

बड़ी ही देर से सही, मगर आवाज तो आई,

यहाँ उजले लिबासों में छिपा हर हाथ काला है।

 

हया बेच कर खाई, अमीरों और वजीरों ने,

तमाशे हैं यहाँ सस्‍ते, मगर महगाँ निवाला है।

 

हमें ठंडा समझने की, तुमने कैसे की गुस्‍ताखी,

जवां हैं मुल्‍क हिन्‍दोस्‍तां, अभी तनमन में ज्‍वाला है।

 

जाओगे अब कहाँ बचकर, यहीं पर टेक लो माथा,

यहाँ आवाम मस्‍जिद हैं, यहाँ जनता शिवाला है।

 

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कवि परिचय-

नाम - सुमित शर्मा

जन्मतिथि - 31 जनवरी 1992

पता - तहसील चौराहा,गायत्री कालोनी,

खिलचीपुर, जिला- राजगढ़(म.प्र.)

शिक्षा - बी.ई.-तृतीय वर्ष (कम्‍प्‍यूटर साइंस) अध्‍ययनरत

साहित्‍यिक रचनाएँ - चलती रहेगी मधुशाला(काव्‍य) , रिश्ते(उपन्‍यास), 35 कविताएँ/गजलें, लघु कहानियाँ । (सभी अप्रकाशित)

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1 टिप्पणी "सुमित शर्मा की ग़ज़ल"

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