मालिनी गौतम का नवगीत

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जरा कवि, अपना मन झकझोर !

गाढ़ अंधेरा

दूर सबेरा

कालकूट का जोर

जरा कवि, अपना मन झकझोर !

 

रक्त विरंजित

दसों दिशाएँ

बर्बरता चहुँ ओर

जरा कवि, अपना मन झकझोर !

 

राज घनेरे

तेरे मेरे

उलझ गई है डोर

जरा कवि, अपना मन झकझोर !

 

राज-पाट के

मूक इशारे

है सत्ता का शोर

जरा कवि, अपना मन झकझोर !

 

लाक्षागृह सी

क्रूर बिसातें

कलुषित है हर भोर

जरा कवि, अपना मन झकझोर !

 

काल-धनुष पर

चढ़ी प्रत्यंचा

सिहर उठा हर पोर

जरा कवि, अपना मन झकझोर !

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डॉ. मालिनी गौतम

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2 टिप्पणियाँ "मालिनी गौतम का नवगीत"

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