गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

अनन्‍त आलोक की लघु कथाएं

 

बिकने वाले

स्‍थानीय निकाय चुनाव में अग्रवाल जी दूसरी बार प्रधान बने तो वोटरों की खरीद फरोख्‍त के आरोपों प्रत्‍यारोपों के बीच बधाइयों का सिलसिला शुरू हुआ। लोग आ कर बधाइयाँ दे रहे थे। इसी सिलसिले में एक सज्‍जन ने आ कर बधाई के साथ साथ मजाकिया अन्‍दाज में कहा ''प्रधान जी आपको बहुत बहुत बधाई, लेकिन हम आपको प्रधान नहीं मानते, क्‍योंकि हमने सुना है कि आप वोटरों को खरीद कर धन के बल पर प्रधान बने हैं''। ''बधाई के लिए हम आपका तहेदिल से आभार प्रकट करते हैं। रही बात वोटरों को खरीदने की तो आप स्‍वयं ही समझदार हैं, हम तो किसी को क्‍या खरीदेंगे और फिर बिकने वाले वोटर होते ही कितने हैं ? ज्‍यादा से ज्‍यादा दस प्रतिशत ! जनाव, यदि सारे ही बिकने वाले होते तो आज डॉ मनमोहन सिंह के स्‍थान पर टाटा बिरला या अंबानी बंधुओं में से कोई एक प्रधानमन्‍त्री होता''। अग्रवाल जी ने जवाब दिया। अग्रवाल जी के इस जवाब से वे सज्‍जन तो सहमत हुए ही मगर सुनने वाले भी सोचने पर मजबूर हो गये।

 

नीच

माता पिता के साथ जा रही एक छह सात वर्ष की लड़की का अचानक पांव फिसला और गहरी खाई में जा गिरी। खून में लथपथ बेटी को उन्‍होंने बड़ी मुश्किल से बाहर निकाला और निकट ही एक घर पर ले गए। घायलावस्‍था में अचेत लड़की को वहां कुछ लोगों ने प्राथमिक उपचार दिया और उसे होश में ले आए। लड़की ने पीने के लिए पानी मांगा तो पिता ने यह कहते हुए मना कर दिया ''ये लोग दलित जाति से संबंध रखते हैं और हम अपनी बेटी को नीच के हाथ का पानी नहीं पिला सकते।'' प्‍यासातुर घायल पुत्री को देख मां के भीतर का इन्‍सान जाग उठा और उसने पानी मंगवाकर पुत्री को पिलाते हुए पति से कहा ''ये लोग समाज में भले ही दलित कहे जाते हों लेकिन नीच नहीं है, वास्‍तव में नीच तो आप हैं। प्‍यास से तड़पती अपनी बेटी से जो पानी छीन ले उस से बड़ा नीच भला कौन हो सकता है।'' पत्‍नी के इस जवाब पर पति की आंखें खुल गई और वह बेटी से क्षमा याचना करने लगा

 

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अनन्‍त आलोक

आलोक भवन, ददाहू,

सिरमौर, हिमाचल प्रदेष, 173022

anantalok1@gmail.com

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