मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

अख़्तरुल ईमान की कविता - काले सफेद परों वाला परिंदा और मेरी एक शाम

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जब दिन ढल जाता है सूरज धरती की ओट में हो जाता है

और भिड़ों के छत्ते जैसी भिन-भिन

बाजारों की गर्मी अफरा तफरी

मोटर, बस, बर्की रेलों का हंगामा थम जाता है

चायखानों, नाचघरों से कमासिन लड़के

अपने हमसिन माशूकों को

जिनकी जिंसी ख्वाहिश वक्त से पहले जाग उठी है

लेकर जा चुकते हैं

बढ़ती फैलती ऊँची हिमालय जैसी तामीरों पर खामोशी छा जाती है

थियेटर तफरीह गाहों में ताले पड़ जाते हैं

और बजाहिर दुनिया सो जाती है

मैं अपने कमरे में बैठा सोचा करता हूं

कुत्तों की दुम टेढ़ी क्यों होती है?


यह चितकबरी दुनिया, जिसका कोई भी किरदार नहीं है

कोई फलसफा कोई पाइंदा इकदार नहीं, मैयार नहीं है

इसपर अहले-दानिश विद्वान फलसफी

मोटी मोटी अदक किताबें क्यूं लिखा करते हैं ?

फुरकत की मां ने शौहर के मरने पर कितना कुहराम मचाया था

लेकिन इद्दत के दिन पूरे होने से इक हफ़्ता पहले

‘नीलम’ के मामूं के साथ बदायूं जा पहुँची थी

बीवी सहनक, कूंडे फातहाख्वानी

जंगे सिफ्फिन, जमल और बंदर के किस्से

सीरते नब्वी, तर्के-दुनिया और मौलवी साहब के

हलवे मांडे में क्या रिश्ता है


दिन तो उड़ जाते हैं

यह सब काले पर वाले बगुले हैँ

जो हंसते खेलते लम्हों को

अपने पंखों में मूंद के आँखों से ओझल हो जाते हैं

राहत जैसे ख्वाब है ऐसे इंसानों का

जिनकी उम्मीदों के दामन में पैबंद लगे हैं

जामा एक तरफ सीते हैं दूसरी जानिब फट जाता है

यह दुनिया लम्हा लम्हा जीती है

मरियम अब कपड़े सीती है

औखों की बीनाई साथ नहीं देती अब

और गजंफर

जो रूमाल में लड्डू बाँध के उसके घर में फेंका करता था

और उसकी आँखों की तौसीफ में गजलें लिखवाकर लाया करता था

उसने और कहीं शादी करली है

अब अपनी लकड़ी की टाल पे बैठा

अपनी कजराई और जवानी के किस्से दोहराया करता है

टाल से उठकर जब घर में आता है

बेटी पर कदगन रखता है

नए जमाने की औलाद अब वैसी नहीं रहगई

बदकारी  बढ़ती जाती है

जो दिन बीत गए कितने अच्छे थे


बरगद के नीचे बैठो या सूली चढ़ जाओ

भैंसे लड़ने से बाज नहीं आएंगे

मौत से हमने एक तअव्वुन कर रक्खा है

पसमंजर में क्या होता है नजर कहाँ जाती है

सामने जो कुछ है रंगों, आवाजों, चेहरों का मेला है ।

गरगल उड़कर वह पिलखन पर जा बैठी

पीपल में तोते ने बने दे रक्खे हैं

गुलदुम जो पकड़ी थी कल बेचारी मर गई

नज्मा के बेलों में कितनी कलियाँ आई हैं

फूलों की खुशबू से क्या क्या याद आता है

यह जब का कि सड़कों पर नई नई बिजली आई थी

और मुझे सीने में दिल होने का एहसास हुआ था

ईद के दिन हमने लट्ठे की शलवारें सिलवाई थी

और सिवैयों का जर्दा हमसाये ने भिजवाया था

सब नीचे बैठक में बैठे थे

मैं ऊपर के कमरे में बैठा

खिड़की से जेनब के घर में फूलों के गुच्छे फेंक रहा था

कल जेनब का घर नीलाम हो रहा है

सरकारी तहवील में था इक मुद्दत से


शायद पतझड़ का मौसम आ पहुंचा

पत्तों के गिरने की आवाज मुसलसल आती है

चेचक का टीका बीमरी को रोके रखता है

जब्ते-तोलीद, इस्कात वगैरह

इंसानी आबादी को बढ़ने से रोकेंगे

बंदर ने जब से दो टाँगों पर चलना सीखा

उसके जेहन ने हरकत में आना सीखा है

पत्तों के गिरने की आवाज मुसलसल आती है

सड़कों पर रोज नए चेहरे मिलते हैं

मौत से हमने एक तअव्वुन कर रक्खा है

पसमंजर में नजर कहाँ जाती है


फूलों की खुशबू से क्या क्या याद आता है

चौक में जिस दिन फूल पड़े सड़ते थे

खूनी दरवाजे पर शहजादों की फाँसी का एलान हुआ था

यह दुनिया लम्हा-लम्हा जीती है

दिल्ली की गलियाँ वैसी ही आबाद-शाद हैं सब

दिन तो काले पर वाले बगुले हैं

जो सब लम्हों को

अपने पंखों में मूँद के आँखों से ओझल हो जाते हैं

चारों जानिब रग रंग के झंडे उड़ते हैं

सबकी जेबों में इंसानों के दुःख- दर्द का दरमाँ खुशियों का नुस्खा बंधा पड़ा है

लेकिन ऐसा क्यूं है

जब नुस्खा खुलता है
1857 जाता है
1947 आता है
..
लिप्यंतर – फ़ज़ल ताबिश
अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित ‘पुनर्वसु, विश्व कविता से एक चयन’ से साभार

1 blogger-facebook:

  1. बेहतरीन हकीकतनामा ......जिन्दगी के कुछ ख़ास लम्हों को बड़ी संजीदगी से पिरोया गया है .....सुभानल्लाह.....

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