गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

एस. के. पाण्डेय की कविता - मानो या न मानो

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पशुओं की सीख: मानो या न मानो

ओ मानव ! हमको पशु कहते खुद मानव कहलाते हो ।

लेकिन मानव ! कुछ न मानो यह सिद्धांत चलाते हो ।।

 

माता-पिता, गुर, गो, ईश्वर, माँ-बहन भी भूले जाते हो ।

बचपन में जो तुझको पालें, अनाथालय भिजवाते हो ।।

 

गो माता का मांस तलक क्या नहीं आज खा जाते हो ।

सदगुर को भी नहीं आज क्या ठेंगा सभी दिखाते हो ।।

 

ईश्वर कौन ? कहाँ ? मैं ही, खुद को ईश्वर बतलाते हो ।

मानव ! जब कुछ भी न मानो क्यों मानव कहलाते हो ।।

 

मानव तुम मानव की दुर्गति करते और कराते हो ।

धन-दौलत की बात ही क्या जबरन तन पे छा जाते हो ।।

 

जब तक पड़ती नहीं शीस पे हँसते और हँसाते हो ।

अपने ऊपर पड़ते तुम भी जोर-जोर चिल्लाते हो ।।

 

दया धरम अरु भले करम से मुँह मोड़े ही जाते हो ।

हम पशु थे अरु आज भी हैं, तुम दिन-दिन गिरते जाते हो ।।

 

मानव ! मानो या न मानो, पशुता को भी लजाते हो ।

मानव ! जब कुछ भी न मानो क्यों मानव कहलाते हो ।।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.) ।

http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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