राजश्री की कविता

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लहरों के अनकहे बोल

एक रात अंधेरे में

किसी घाट के किनारे

कोई आरती में खोया

कोई पलके मूंदे लेटा रहा

उसी घाट पर बैठे

सुने मैंने लहरों के अनकहे बोल

वो जो लहरों ने एक अकेले दिये से कहे

जानती हूं सब समझते हैं कि जो न कहा

वह सुना कैसे?

 

लहरों से लहरों को मिलते सब देखते हैं

वे आपस में क्या कहती हैं?

हवायें जब पत्तियां उड़ाती हैं

पत्तियां आपस में क्या कहती हैं?

कहां सुन पाते हैं उनके बोल

या यूं कहें कहां समझ पाते हैं हम वे बोल?

पर किसी एक दिन ऐसा हो जाता है

घाट पर स्थापित एक अकेला नंदी एक शिवलिंग

एक खेल अजीब सा रचता है और

सुनती हूं मैं वे अनकहे बोल

 

लहरों ने अपनी अंजुरी में समेट दिये को कहा

"दूर आ गये तुम रोशनी के साथ तैरते हुए

किनारा पीछे छूटा वह हाथ पीछे छूटे

वह घाट भी छूटा जहां पर मंदिर है

जो अंधेरे में रोशनी से भरा दिखता है

क्योंकि बहुत से दिये अंदर जलते हैं

छूटा वह संगीत जिसका अंतिम बोल तुम

किसी ने किसी उम्मीद से तुम्हें रोशनी दी

और छोड़ दिया अपनी अंजुरी से मेरी अंजुरी में

जिससे दूसरे किनारे पर कोई तुम्हें देख सके

वो दिये जो मंदिर में जलते हैं ,

बस एक मंदिर के दिये होते हैं

जो बस एक मूर्ति के सामने रोशनी खोते हैं

 

जानती हूं लो तुम्हारी कांपती है हवा से

मेरी हलचल भी तुम्हें भयभीत करती है

पर तुम जानते हो फिर भी उस घड़ी तक बहना ही है

वो छोर तुम्हें पाना ही है जो तुम्हारा है

और कुछ देर में तुम

झकोलों को झूला समझ कर

झूलते झूलते वहा पहुंच जाते हो

मुझे हर तुम्हारे जैसा दिया प्यारा है

जिसने गहन निशा में रोशनी के चुम्बन से

मेरे माथे पर टीका लगाया है।"

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राजश्री

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1 टिप्पणी "राजश्री की कविता"

  1. राजश्री जी सुंदर कविता के लिए बधाई ! देखिये हम रोशनी भी उसे दिखाते हैं जो सारे जहाँ को रोशन करता है | आपकी कविता ने एक नया विषय दे दिया है थैंक्स |

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