शनिवार, 2 अप्रैल 2011

राजश्री की कविता

DSCN4491 (Custom)

लहरों के अनकहे बोल

एक रात अंधेरे में

किसी घाट के किनारे

कोई आरती में खोया

कोई पलके मूंदे लेटा रहा

उसी घाट पर बैठे

सुने मैंने लहरों के अनकहे बोल

वो जो लहरों ने एक अकेले दिये से कहे

जानती हूं सब समझते हैं कि जो न कहा

वह सुना कैसे?

 

लहरों से लहरों को मिलते सब देखते हैं

वे आपस में क्या कहती हैं?

हवायें जब पत्तियां उड़ाती हैं

पत्तियां आपस में क्या कहती हैं?

कहां सुन पाते हैं उनके बोल

या यूं कहें कहां समझ पाते हैं हम वे बोल?

पर किसी एक दिन ऐसा हो जाता है

घाट पर स्थापित एक अकेला नंदी एक शिवलिंग

एक खेल अजीब सा रचता है और

सुनती हूं मैं वे अनकहे बोल

 

लहरों ने अपनी अंजुरी में समेट दिये को कहा

"दूर आ गये तुम रोशनी के साथ तैरते हुए

किनारा पीछे छूटा वह हाथ पीछे छूटे

वह घाट भी छूटा जहां पर मंदिर है

जो अंधेरे में रोशनी से भरा दिखता है

क्योंकि बहुत से दिये अंदर जलते हैं

छूटा वह संगीत जिसका अंतिम बोल तुम

किसी ने किसी उम्मीद से तुम्हें रोशनी दी

और छोड़ दिया अपनी अंजुरी से मेरी अंजुरी में

जिससे दूसरे किनारे पर कोई तुम्हें देख सके

वो दिये जो मंदिर में जलते हैं ,

बस एक मंदिर के दिये होते हैं

जो बस एक मूर्ति के सामने रोशनी खोते हैं

 

जानती हूं लो तुम्हारी कांपती है हवा से

मेरी हलचल भी तुम्हें भयभीत करती है

पर तुम जानते हो फिर भी उस घड़ी तक बहना ही है

वो छोर तुम्हें पाना ही है जो तुम्हारा है

और कुछ देर में तुम

झकोलों को झूला समझ कर

झूलते झूलते वहा पहुंच जाते हो

मुझे हर तुम्हारे जैसा दिया प्यारा है

जिसने गहन निशा में रोशनी के चुम्बन से

मेरे माथे पर टीका लगाया है।"

----

 

राजश्री

1 blogger-facebook:

  1. राजश्री जी सुंदर कविता के लिए बधाई ! देखिये हम रोशनी भी उसे दिखाते हैं जो सारे जहाँ को रोशन करता है | आपकी कविता ने एक नया विषय दे दिया है थैंक्स |

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

और दिलचस्प, मनोरंजक रचनाएँ पढ़ें-

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------