गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

हिमकर श्‍याम की ग़ज़ल

ग़ज़ल

अज़मे सफर सरों पे उठाना है दूर तक

ले जिन्‍दगी का साथ जाना है दूर तक

 

परछाइयां भी छोड़ गईं आज मेरा साथ,

पर गम को मेरा साथ निभाना है दूर तक

 

जी भर के जिन्‍दगी से करूं प्‍यार, था ख्‍याल

इस रह पे आंसुओं का ठिकाना है दूर तक

 

ये जिन्‍दगी नहीं है वफाओं का सिलसिला,

सांसों के टूटने का फसाना है दूर तक

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अजमे सफर ः सफर का इरादा/दृढ़-निश्‍चय,

हिमकर श्‍याम

द्वारा ः एन. पी. श्रीवास्‍तव

5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,

रांचीः 8, झारखंड।

7 blogger-facebook:

  1. शानदार प्रयास | सिलसिले को बरक़रार रखें | शुभकामनाएँ

    उत्तर देंहटाएं
  2. shantanu krishna11:44 am

    bhai sahab, aapki is rachna ne dil ko drawit kar diya...khuda kare aap yuhi likhte rahe,,

    उत्तर देंहटाएं
  3. भौतिकता के अंधी दौर में कर्वी सच से मिलाती ये ग़ज़ल
    जिंदगी जीने और काटने का अंतर समझाती ये ग़ज़ल
    जिंदगी के विभिन पहलु से रूबरू कराती ये ग़ज़ल
    परिस्थितियो पर हौसले की जीत को दर्शाती ये ग़ज़ल

    उत्तर देंहटाएं
  4. मन के हारे हार मन के जीते जीत को सही अर्थो में समझाती आपकी ये ग़ज़ल ||

    उत्तर देंहटाएं

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