गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बालगीत

        प्यारा घोड़ा

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         घोड़ा है भाई घोड़ा है
         कितना प्यार घोड़ा है
         मुंबई से दिल्ली तक का
         उसने रस्ता जोड़ा है|

         टिक टिक टिक टिक चलता है
         जोर जोर से हिलता है
         जैसे ही मारो हंटर
         कूदे और उछलता है
         उछलकूद करने में ही
         घर का मटका फोड़ा है|

         पल में चेन्नई पहुंचाता
         उड़कर कोलकाता जाता
         आसमान में उड़ते ही
         फर फर फर फर फर्राता
         मेरे विश्वासों को भी
         कभी न उसने तोड़ा है|

         जहां हुई मेरी इच्छा
         पल भर में पहुंचा देता
         गुल्ली टुल्ली अम्मू से
         तुरत फुर‌त‌ मिलवा देता
         दादा दादी चाचा से
         मीठा रिश्ता जोड़ा है|

          दूध मलाई खाता है
          हँसता है मुस्काता है
          जैसे देखे रसगुल्ला
          खाने को ललचाता है
          खड़े खड़े ही बेचारा
          सो लेता वह थोड़ा है|

       कहीं कहीं पर अड़ जाता
      सब पर भारी पड़ जाता
      नहीं मानता कहना फिर‌
      कसकर जिद्द पकड़ जाता
      कभी कभी तो गुस्से में
      खाना पीना छोड़ा है|

      मैं उसको नहलाती हूं
      प्रतिदिन तेल लगाती हूं
      सुबह शाम ताजे जल से
      उसका मुंह धुलवाती हूं
      उसकी साफ सफाई में
      लगता साबुन सोड़ा है|


    घोड़ा बहुत भला है ये
    मुझको अभी मिला है ये
    जैसे खिलते राज कमल‌
    वैसा खिला खिला है ये
    दुनियां के सब घोड़ों से
    सबसे न्यारा घोड़ा है|

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