बुधवार, 13 अप्रैल 2011

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य : जब गधे पंजीरी खा गए

 

आम तौर पर जब भगवान सत्यनारायण की कथा होती है तब अन्यान्य खाद्य-पदार्थों, पंच-मेवा, पंच-फल, पुंगी फल, पान और चरणामृत के साथ-साथ उनको पंजीरी का भी भोग लगाया जाता है। तत्पश्चात् सभी भक्तगण पंजीरी का प्रसाद पाते हैं। इस प्रकार स्वाभाविक रूप से पंजीरी पर भगवान सत्यनारायण का और उनका भोग लग जाने पर उनके भक्तों का हक बनता है। लेकिन तकलीफ तब होती है जब गधे सारी पंजीरी खा जाते हैं और सर्वभावेन सक्षम भगवान तथा उनकी सक्षमता का बखान करके जीवन-पर्यंत सुखोपभोग करनेवाले उनके भक्तगण भकुआ बने देखते रह जाते हैं।

अब सवाल यह उठता है कि जब आपके परिवेश में पंजीरी थी और उसके लिए पहले से ही बहुत बढ़िया उद्देश्य मुकर्रर था तो आपने उसे इस प्रकार लावारिस क्यों छोड़ दिया कि खुद भगवान और उनके भक्तों से भी पहले कोई अदना-सा गधा उसे चट कर जाए। इससे दो बातें सिद्ध होती हैं- एक तो यह कि आप बेहद लापरवाह हैं और अपनी मूल्यवान वस्तुओं की रक्षा करने का शऊर आपको नहीं है। दूसरा यह कि गधा आपकी तुलना में अधिक चालाक, चतुर, मौके का फायदा उठाने के लिहाज से सयाना और कुल मिलाकर आपसे भी बुद्धिमान प्राणी है। उसे मूर्ख समझना और कहना खुद अपने बौद्धिक दिवालिएपन की घोषणा करना है। एक तीसरा निष्कर्ष भी निकलता है, जिसे हम बताना तो नहीं चाहते थे, किन्तु पहली दो प्रपत्तियों को सिद्ध करने और आपके संपूर्ण नयनोन्मीलन के खयाल से बताने को विवश हो रहे हैं। तो तीसरा निष्कर्ष यह है कि भगवान सत्यनारायण खुद अपने ही सत्तू-पंजीरी की रक्षा करने में भी असमर्थ हैं। इसका प्रमाण यह है कि जिसे सदियों से हम भारवाही, मूर्ख गधा समझते आए वह भी दुनिया बनानेवाले और उसके पालनहार भगवान के भोग के निमित्त रखी पंजीरी उड़ा ले जाता है और भगवान लाचार-से देखते रह जाते हैं।

बुद्धिमान जीव के साथ यही सबसे बड़ी दिक्कत है। वह हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है, क्या करूँ क्या न करूँ का गणित बिठाता रहता है और मूर्ख गधा अपना काम कर जाता है। अधिक पढ़-लिख लेने पर आदमी अकर्मण्य हो जाता है। उसकी प्रखर हो चुकी तर्क-शक्ति किसी काम में प्रवृत्त होने से पहले ही हजार तरह के सवाल उसके सामने खड़े कर देती है और अंततः वह किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में पहुँचकर कुछ भी नहीं कर पाता। मूर्ख को ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि प्रायः वह ज्यादा चिंतन की स्थिति में होता ही नहीं। उसे मालूम है कि पंजीरी खाने की चीज है। इधर पंजीरी निगाह में आई और उधर चट। पंजीरी किसकी है, किसके लिए है, यह सब सोचने की जरूरत वह नहीं समझता। आदर्श और सदाचार से उसका कोई सरोकार नहीं। इसलिए वह पंजीरी उड़ा ले जाता है और समझदार को समझ ही नहीं आता कि मूर्ख के हाथ जाती पंजीरी की रक्षा कैसे करे।

अब आप खुश हो गए होंगे कि चलो पंजीरी गई तो क्या, बुद्धिमत्ता का तमगा तो मिला! यही हम मध्यवर्गियों की विडंबना है। हम इन तमगों को लिए-लिए घूम रहे हैं। हमारे बच्चे नब्बे-पिच्चानबे-निन्यानबे प्रतिशत अंक ला रहे हैं। अपने देश के गधे भी बी.टेक. करने लगे हैं। हिन्दुस्तानियों की गणना दुनिया के सबसे पढ़े-लिखे लोगों में हो रही है। दुनिया के हर देश में हमारे टेक्नोक्रैट आगे बढ़ रहे हैं। बस अपने घर में ठाकुरजी को भोग लगाने के लिए जो थोड़ी-सी पंजीरी हमने बनाई थी, उसीकी रक्षा करने में ही हम खुद को असमर्थ पा रहे हैं। अपनी पंजीरी, अपने आदर्शों, अपने जीवन-मूल्यों की रक्षा कैसे करें, यह तो किसी कॉलेज ने हमें सिखाया ही नहीं। लिहाजा आदर्शों और जीवन-मूल्यों की लुगदी बनाकर चबा जानेवाला गधा से हमारी सारी पंजीरी खा रहा है और दूर बैठे बस उसे टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं।

आज अचानक कई दशकों बाद हमें अपनी पंजीरी की चेत आई है। अठहत्तर वर्षीय अन्ना हजारे साहब को अचानक विचार आया है कि अरे यार अब तक जो भी पंजीरी अपने भारत के लोगों ने बनाई थी, वह तो सारी की सारी गधे खा गए। कुछ ने उसका गोबर यहीं पोंक रखा है और कुछ अपनी लेंड़ी भी स्विटजरलैंड के तबेले में रख आए। खैर.. अब चलो ऐसा कुछ उपाय करो कि आगे जो पंजीरी बने उसे गधे न खाने पाएँ। इसकी शुरुआत अन्ना साहेब ने खुद भूखे रहकर, यानी पंजीरी की ओर से निगाह हटाकर की है। इसी को लोग सत्याग्रह का नाम दे रहे हैं। नई पीढ़ी के लोगों को तो याद ही नहीं था कि पंजीरी पर भगवान और तदनन्तर उनके भक्तों यानी आम-फहम का भी हक बनता है। वे तमाम कोशिशें करके पंजीरी तैयार करते और जमा करते जाते, गधे उसे चट कर लेते। यही देखते-देखते आजाद भारत की तीन पीढ़ियाँ गुजर गईं। इन पीढ़ियों के लगभग सभी आम नागरिक तो यही माने बैठे थे कि पंजीरी गधों का ही स्वाभाविक भोजन है और देश के बुद्धिजीवियों व आम नागरिकों को गधों के चरण-स्पर्श, गधों की चरण-रज और गधों के चरणामृत को ही अपना परम प्राप्य समझना चाहिए। अचानक अन्ना साहेब के बताने पर सबको याद आया है कि अरे भइया पंजीरी तो सत्यनारायण, दरिद्र नारायण और देश के आम-फहम के हिस्से की खुराक है।

खैर, देर आयद- दुरुस्त आयद। अब हमें घर बैठे मोबाइल फोन से पिजा, पास्ता और बर्गर के ऑर्डर देने से बचना चाहिए। बल्कि घर और दफ्तर के आरामदेह एसी-युक्त माहौल से निकलकर जरा अपनी पंजीरी की ओर भी ध्यान देना चाहिए। माना कि पंजीरी खाने की हमारी आदत छूट चुकी है और गधे को उसकी लत लग चुकी है। लेकिन ये पंजीरी हमारी है। कभी-कभार जायका बदलने के लिए पिजा, पास्ता, बर्गर और केएफसी चाहे चख लें, लेकिन पंजीरी के बिना हमारा काम नहीं चलनेवाला। वह अपनी स्टेपल डाइट है। बंध्या बौद्धिकता के पाश से खुद को मुक्त कराकर हम अपने खून-पसीने की कमाई से बनी पंजीरी को बचा सकें तो गधे की तुलना में अपने को समझदार समझने का दंभ हम पर फबेगा, वर्ना तो यही सिद्ध होता रहेगा गधा ही हमसे श्रेष्ठतर जीव है। यदि हम अब भी नहीं चेते तो गधों की लात खाने के लिए हम हिन्दुस्तानियों को पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए। गधे- जो कई दशकों तक पंजीरी खा-खाकर खूब हट्टे-कट्टे हो चले हैं और सत्ता के गलियारों में अब जिनकी रेंक गूंजती है।

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डॉ. रामवृक्ष सिंह

आर.वी.सिंह/R.V. Singh

rvsingh एट sidbi.in

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