हिमकर श्याम की ग़ज़ल - सुलगती रेत पे भटका किए उम्र भर...

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ग़ज़ल

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मुक्‍तसर-सी जिन्‍दगी हसरतों में निक़ल गयी

कुछ उम्‍मीदों पे और कुछ आहों में पल गयी

 

तकदीर लेके गयी जिधर उधर ही हम गये

कभी बहलाया हमे तो कभी चाल चल गयी

 

कांधे पे उठाये रहे हम अरमानों की गठरियां

वक्‍त की ठोकरों से हर चाहत मचल गयी

 

खाक-ए-तम्‍मना का वो मातम फिजूल था

दिल की बर्बादियां कई सांचों में ढ़ल गयी

 

सुलगती रेत पे भटका किये जो उम्र भर

मेहरबां हुई हयात जब तो उम्र छल गयी

 

लबों पे आत-आते रह गयी रक्‍से-तबस्‍सुम

सांसों के तरन्‍नुम पे गमे दुनिया बहल गयी

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हिमकर श्‍याम

द्वारा ः एन. पी. श्रीवास्‍तव

5, टैगोर हिल रोड,

मोराबादी, रांचीः 8

झारखंड।

परिचय ः वाणिज्‍य एवं पत्रकारिता में स्‍नातक। प्रभात खबर और दैनिक जागरण में उपसंपादक के रूप में काम। विभिन्‍न विधाओं में लेख वगैरह प्रकाशित। कुछ वर्षों से गंभीर बीमारी से जंग। फिलहाल इलाज के साथ-साथ स्‍वतंत्र रूप से रचना कर्म।

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4 टिप्पणियाँ "हिमकर श्याम की ग़ज़ल - सुलगती रेत पे भटका किए उम्र भर..."

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