शनिवार, 23 अप्रैल 2011

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : सड़ेला सिस्टम

जैसा कि आप जानते है, सिस्‍टम याने व्‍यवस्‍था याने प्रबन्‍धन जो है वह सड़ गया है, और इस सड़ी हुई व्‍यवस्‍था में से जब तब सड़ान्‍ध आती रहती है। यह सड़ान्‍ध कभी भ्रष्टाचार के रुप में आती है तो कभी घोटालों के रुप में। मेरे एक पत्रकार मित्र का कहना है कि व्‍यवस्‍था केवल सड़ी ही नहीं है बल्‍कि इस सड़ी हुई व्‍यवस्‍था में कीड़े पड़ गये है और ये कीड़े दीमक बन कर व्‍यवस्‍था या सिस्‍टम को खा रहे हैं। नोंच रहे है और इस झगड़े के कारण व्‍यवस्‍था का रोज चीरहरण हो रहा है। द्रौपदी रुपी व्‍यवस्‍था, दुशासन के हाथों निर्वस्‍त्र होती जा रही है। धृतराष्ट्र, विदुर और भीष्म दयनीय दृष्टि से इस सड़ी हुई व्‍यवस्‍था को देख रहे है। हम सब भोग रहे है। बजट की घोषणाओं से व्‍यवस्‍था को जो फायदे हो वे सब एक अप्रेल से लागू लेकिन आमजन को होने वाले लाभों के लिए बाबू कहते है आदेश आने दो। मुझे रेलवे ने बताया कि सड़ी हुई व्‍यवस्‍था के कारण आपको कन्‍शेशन नहीं मिल सकता। रोडवेज तो और भी एक कदम आगे निकला स्पष्ट जवाब आया कन्सेशन के आदेश मंत्री की जेब में पड़े है, जाओ और निकाल लाओ। आखिर सड़ी हुई व्‍यवस्‍था हम सब पर इतनी हावी क्‍यों हैं ? कारण बिलकुल स्पष्ट है हम सब कमजोर और काम चोर है, कभी कोई अन्‍ना जन्‍तर मन्‍तर से हमें जगाता है तो कोई प्रशान्‍त या कोई किरण सब गुड़ गोबर करने को आ जाते है।

सड़ी हुई व्‍यवस्‍था को सुधारने के लिए किसी नायक की जरुरत होती है। नायक बनना भी आसान नहीं है। व्‍यवस्‍था अपने स्‍वार्थ के आधार पर किसी को नायक बनाती है और स्‍वार्थ पूर्ति के बाद तुरन्‍त उसे इतिहास की रद्‌दी की टोकरी में फेंक देती है। या कभी कभी खलनायक के रुप में प्रस्‍तुत कर देती है। क्‍या व्‍यवस्‍था एक दिन में सड़ गई। हम सब ने इस व्‍यवस्‍था को सड़ने में मदद की है। हर सेवा निवृत व्‍यक्‍ति अखबारों के माध्‍यम से अपने विभाग की कमियां बताता है, अपने विभाग को कोसता है, विनम्रता पूर्वक ये तो पूछा ही जा सकता है कि जब वह व्‍यक्‍ति विभाग में था तब सुधार के प्रयास क्‍यों नहीं किये। तब वह व्‍यक्‍ति विभाग और व्‍यवस्‍था का पुर्जा बन कर व्‍यवस्‍था से लाभ ले रहा था और अब व्‍यवस्‍था को गरिया रहा है। लतिया रहा है, और हीरो बनने के असफल प्रयास कर रहा है। हजारों बड़े अधिकारी, जज, पुलिसवाले, बाबू, नेता सब व्‍यवस्‍था के लाभ लेकर व्‍यवस्‍था को कोसते है। कुढ़ते है और बेचारी व्‍यवस्‍था और ज्‍यादा सड़ने लग जाती है। सड़ी हुई व्‍यवस्‍था के लिए रोज नये प्रशासनिक सुधार आयोग बनाये जाते है। रोज नई जांच एजेन्‍सियां बनाई जाती है और परिणाम ढ़ाक के तीन पात। जितनी ज्‍यादा जांच एजेन्‍सियां उतना ज्‍यादा भ्रष्टाचार क्‍योंकि हर जांच एजेन्‍सी अपना हिस्‍सा मांगती है। हीरो तो जनता बनाती है। महात्‍मा गान्‍धी, अन्‍ना हजारे, जयप्रकाश जी के उदाहरण सामने है, वास्‍तव में व्‍यवस्‍था चौराहे पर पड़ी कुतिया है जिसे हर कोई लात मारता है। इस सड़ी हुई व्‍यवस्‍था से भी तो श्रेष्ठ निष्कर्ष निकालने के ईमानदार प्रयास किये जा सकते है, मगर ईमानदार प्रयासों से ज्‍यादा आसान है व्‍यवस्‍था को सड़ी हुई-मरी हुई, गन्‍धाती हुई कहना और आगे बढ़ जाना। इस जीर्ण-क्षीर्ण, खण्‍डहर, टूटी फूटी व्‍यवस्‍था रुपी घोड़े पर ईमानदारी के चाबुक चलाने वाला ही सच्‍चा हीरो बनेगा। आईये आपका स्‍वागत है।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

म․उंपस प्‍क्‍ ․ लाावजींतप3/हउंपसण्‍बवउ

उ․․09414461207

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