शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

शमशेर बहादुर सिंह की लंबी कविता - अमन का राग

अमन का राग
सच्चाइयाँ
जो गंगा के गोमुख से मोती की तरह बिखरती रहती है
हिमालय की बर्फीली चोटी पर चांदी के उन्मुक्त नाचते
परों में झिलमिलाती रहती हैं
जो एक हजार रंगों के मोतियों का खिलखिलाता समंदर है
उमंगों से भरी फूलों की जवान कश्तियाँ
कि बसंत के नये प्रभात सागर में छोड़ दी गई हैं ।

ये पूरब पश्चिम मेरी आत्मा के ताने बाने हैं
मैंने एशिया की सतरंगी किरनों को अपनी दिशाओं के गिर्द
लपेट लिया
और मैं यूरोप और अमरीका को नर्म आँच की धूप छांव पर

बहुत हौले-हौले नाच रहा हूँ
सब संस्कृतियाँ मेरे सरगम में विभोर हैं
क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख शांति का राग हूँ
बहुत आदिम बहुत अभिनव ।

हम एक साथ उषा के मधुर अधर बन उठे
सुलग उठे हैं
सब एक साथ ढाई अरब धड़कनों में बज उठे हैं
सिम्फोनिक आनंद की तरह
यह हमारी गाती हुई एकता
संसार के पंच परमेश्वर का मुकुट पहन
अमरता के सिंहासन पर आज हमारा अखिल लोक प्रेसिडेंट
बन उठी है
 
देखो न हकीकत हमारे समय की कि जिसमें
होमर एक हिन्दी कवि सरदार जाफरी को
इशारे से अपने करीब बुला रहा है
कि जिसमें
फैयाज खाँ विटाफेन के कान में कुछ कह रहा है
मैंने समझा कि संगीत की कोई अमर लता हिल उठी
मैं शेक्सपियर का ऊंचा माथा उज्जैन की घाटियों में
झलकता हुआ देख रहा हूं
और कालिदास को वैमर के कुंजों में विहार करते
और आज तो मेरा टैगोर मेरा हाफिज मेरा तुलसी मेरा गालिब
एक एक मेरे दिल के जगमग पावर हाउस का
कुशल आपरेटर है ।

आज सब तुम्हारे ही लिए शांति का युग चाहते हैं
मेरी कुटूबुटू
तुम्हारे ही लिए मेरे प्रतिभाशाली भाई तेजबहादुर
मेरे गुलाब की कलियों से हंसते खेलते बच्चों
तुम्हारे ही लिए, तुम्हारे ही लिए
मेरे दोस्तों, जिनसे जिंदगी में मानी पैदा होते हैं
और उस निश्छल प्रेम के लिए
जो माँ की मूर्ति है
और उस अमर परमशक्ति के लिए जो पिता का रूप है ।
हर घर में सुख
शांति का युग
हर छोटा-बड़ा हर नया-पुराना हर आज-कल परसों के
आगे और पीछे का युग
शांति की स्निग्ध कला में डूबा हुआ
क्योंकि इसी कला का नाम जीवन की भरी पूरी गति है ।

मुझे अमरीका का लिबर्टी स्टैचू उतना ही प्यारा है
जितना मास्को का लाल तारा
और मेरे दिल में पेकिंग का स्वर्गीय महल
मक्का मदीना से कम पवित्र नहीं
मैं काशी में उन आर्यों का शंखनाद सुनता हूं
जो वोल्गा से आए
मेरी देहली में प्रह्लाद की तपस्याएं दोनों दुनियाओं की चौखट पर

युद्ध के हिरण्यकश्यप को चीर रही हैं ।
यह कौन मेरी धरती की शांति को आत्मा पर कुरबान हो गया है
अभी सत्य की खोज तो बाकी ही थी
यह एक विशाल अनुभव की चीनी दीवार
उठती ही बढ़ती आ रही है
उसकी ईंटें धड़कते हुए सुर्ख दिल हैं
यह सच्चाइयाँ बहुत गहरी नीवों में जाग रही हैं
वह इतिहास की अनुभूतियाँ हैं
मैंने सोवियत यूसुफ के सीने पर कान रखकर सुना है ।
आज मैंने गोर्की को होरी के आँगन में देखा
और ताज के साये में राजर्षि कुंग को पाया
लिंकन के हाथ में हाथ दिये हुए
और तालस्ताय मेरे देहाती यूपियन होंठों से बोल उठा
और अरागों की आँखों में नया इतिहास
मेरे दिल की कहानी की सुर्खी बन गया
मैं जोश की वह मस्ती हूं जो नेरुदा की भवों से
जाम की तरह टकराती है
वह मेरा नेरुदा जो दुनिया के शांति पोस्ट आफिस का
प्यारा और सच्चा कासिद
वह मेरा जोश कि दुनिया का मस्त आशिक
मैं पंत के कुमार छायावादी सावन भादों की चोट हूँ
हिलोर लेते वर्ष पर
मैं निराला के राम का एक आँसू
जो तीसरे महायुद्ध के कठिन लौह पर्दों को
एटमी सुई-सा पार कर गया पाताल तक
और वहीं उसको रोक दिया
मैं सिर्फ एक महान विजय का इंदीवर जनता की आँख में
जो शांति की पवित्रतम आत्मा है ।

पच्छिम में काले और सफेद फूल हैं और पूरब में पीले और लाल
उत्तर में नीले कई रंग के और हमारे यहाँ चम्पई-साँवले
और दुनिया में हरियाली कहाँ नहीं
जहां भी आसमान बादलों से जरा भी पोंछे जाते हों
और आज गुलदस्तों में रंग-रंग के फूल सजे हुए हैं
और आसमान इन खुशियों का आईना है ।

आज न्यूयार्क के स्काईस्क्रेपरों पर
शांति के ‘डवों’ और उसके राजहंसों ने
एक मीठे उजले सुख का हलका सा अंधेरा और शोर पैदा कर दिया है ।
और अब वो आर्जेन्टीना की सिम्त अतलांतिक को पार कर रहे हैं
पाल राव्सन ने नई दिल्ली से नये अमरीका की
एक विशाल सिम्फनी ब्राडकास्ट की है
और उदयशंकर ने दक्षिणी अफीका में नये अजंता को
स्टेज पर उतारा है
यह महान नृत्य वह महान स्वर कला और संगीत
मेरा है यानी हर अदना से अदना इंसान का
बिल्कुल अपना निजी ।
युद्ध के नक्शों को कैंची से काटकर कोरियायी बच्चों ने
झिलमिली फूलपत्तों की रौशन फानूसें बना ली हैं
और हथियारों का स्टील और लोहा हजारों
देशों को एक-दूसरे से मिलाने वाली रेलों के जाल में बिछ गया है
और ये बच्चे उन पर दौड़ती हुई रेलों के डब्बों की खिड़कियों से
हमारी ओर झांक रहे हैं
यह फौलाद और लोहा
खिलौनों मिठाइयों और किताबों से लदे स्टीमरों के रूप में
नदियों की सार्थक सजावट बन गया है
या विशाल ट्रैक्टर कम्बाइ और फैक्टरी मशीनों के हृदय में
नवीन छंद और लय का प्रयोग कर रहा है।

यह सुख का भविष्य शांति की आँखों में ही वर्तमान है
इन आँखों से हम सब अपनी उम्मीदों की आंखें सेंक रहे हैं
ये आँखें हमारे दिल में रौशन और हमारी पूजा का फूल हैं
ये आँखें हमारे कानून का सही चमकता हुआ मतलब
और हमारे अधिकारों की ज्योति से भरी शक्ति हैं
ये आँखें हमारे माता पिता की आत्मा और हमारे बच्चों का दिल हैं
ये आंखें हमारे इतिहास की वाणी
और हमारी कला का सच्चा सपना हैं
ये आँखें हमारा अपना नूर और पवित्रता हैं
ये आँखें ही अमर सपनों की हकीकत और
हकीकत का अमर सपना हैं
इनके देख पाना ही अपने आपको देख पाना है, समझ पाना है।
हम मनाते हैं कि हमारे नेता इनको देख रहे हों ।

--

काव्य संकलन - टूटी हुई, बिखरी हुई  से साभार

2 blogger-facebook:

  1. शमशेर बहादुर सिंह की लंबी कविता .
    प्रस्तुत करने के लिये बहुत -बहुत धन्यवाद्

    उत्तर देंहटाएं
  2. भव्य कविता है|
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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