गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर की कविता - हे दरूही जनता!

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हे दरुही जनता!

 

क्या तुमने अब तक भी जाना नहीं कि,

लोकतंत्र है एक बेज़ुबान कागज का़ घोड़ा

ज़रा-सा भीगा क़ि

हो जाता है लुंज-पुंज

समय-असमय

इसे भिगो भी देते हैं

नेता, नौकरशाह

और,

कुछ कम नहीं हो तुम भी तो

लटक जाती हो

इसके अयाल से

गिर भी पड़ती हो ज़्यादातर

पर,चढ़ती ज़रूर हो

हर बार रेस से ठीक पहले

चुनाव के दौरान

 

हे दरुही जनता!

जब तुम चढ़ती हो

इस घोड़े की नंगी पीठ पर

अयाल नोच डालती हो

पीठ छिल जाती है इसकी

कभी-कभी तो दम ही तोड़ देता है

यह बेज़ुबान कागज का़ घोड़ा

वैसे भी बेजान ऊपर से बेज़ुबान

कितना भी दौड़ाओ

जहाँ का तहाँ

काठियावाड़ी घोड़े की तरह

अड़ा खड़ा रहता है

पर, हिनहिनाता जोरों से है

लगता है कि सारी धरती नाप डालेगा

चरणों से

जगह-जगह ताल बना देगा खोद-खोद कर

अपने लोहा जड़े मज़बूत खुरों से

और तुम फूलकर कुप्पा हो जाती हो

इसकी दमदार(दुमदार)हिनहिनाहट पर

और जब निकलता है परिणाम शून्य

माथा ठोंक लेता है सवार

सिर पकड़ कर बैठ जाता है सवार और तुम भी

सारा का सारा प्रशिक्षण और रातिब

चला जाता है व्यर्थ

हो जाते हैं पौ बारह सट्टेबाजों के

क्योंकि केवल उन्हें ही पता होता है

इस घोड़े का असली दम

इसीलिए तो

वे ही जीतते हैं हर बार

 

यह तो तुम्हें भी पता है कि-               

पाँच साल बाद ही इसे निकाला जाता है

अस्तबल से बाहर

रेसकोर्स या गोल्फ के मैदान में दौड़ाने के वास्ते

अमीरों के शौक के वास्ते

खूब सजाया जाता है इसे

घुँघरू और पट्टे भी पहनाए जाते हैं

और,

दम तोड़ देने के बाद

कहाँ दफ़नाया जाता है

यह किसी को पता नहीं चलता

शायद तुम्हें तो बिल्कुल ही नहीं

और, यदि तुममें से किसी को हो तो

बताना ज़रूर

लेकिन नशा उतर जाने के बाद ही

अबकी तो हमको भी लगाना है शर्त

जीतना है सट्टा लेकतंत्र का

 

वह, इसलिए कि

इस पर बैठ कर पड़े घट्ठे

फोड़े बनकर फूटने को हैं

उनकी टनक से बेचैन हूँ                   

बैठ नहीं पाता हूँ

सो नहीं पाता हूँ रात-रात

दिन को सताता (दौड़ा- दौड़ा कर) है पेट

और रात को नाना चिंताएँ

आखिर क्या है इसका इलाज़

सोच नहीं पाता हूँ

फिर भी यही सोच-सोच कर

पगला जाता हूँ

बड़बड़ाता हूँ सड़कों पर

घर आते-आते

मौन भी हो जाता हूँ

 

बड़े पगों की पायल

या नन्हे पगों की पैजनियाँ

आखिर कोई न कोई

कर ही रहा होता है

किसी न किसी बहाने इंतज़ार

कभी बहुत दूर से आती हुई

शहनाई की धुन में खो जाता हूँ

कभी-कभी सो भी जाता हूँ

इस आशा में कि

कभी तो दौड़ेगा घोड़ा लोकतंत्र का

असली में बदलेगा ज़रूर

वरना,

इससे लाख गुना अच्छे हैं

हुसेन के कैनवासी घोड़े

जो देते हैं चमक आँखों को

हौसला मन को कि,

दौड़ो,

दौड़ो तुम भी हमारी तरह

हो जाओ हमारी ही तरह बेजान, बेज़ुबान

बिक जाओ करोड़ों में

टँग जाओ अंबानी, टाटा, बिड़ला

या सिंहानिया के घर

या फिर किसी संग्रहालय की

पपड़ी छोड़़ती दीवारों पर

तुम भी मेरी तरह

दर्शनीय हो जाओ

प्रदर्शनीय बन जाओ

 

कम से कम

इतना तो कर ही जाओ उनके लिए

जो घर से निकलने से पहले से

(यानी सूरज के निकलने से पहले से)

अस्त होने तक व्यस्त रहते हैं

तुम्हारी घुड़सवारी की तैयारी में

और तुम हो कि घोड़े से भी

कुछ ज़्यादा ही

हाँफते हुए लौटते हो घर

जैसे तुमने ही मारा हो मैदान

साफ कर दिया हो

सूपड़ा विरोधियों का

 

यह काग़ज़ी शेर

यानी सवार यानी पहरुआ

लोकतंत्र का

कुछ ज़्यादा ही जल्दी

पस्त हो जाता है

चंद अटपटे सवालों से

तुम्हारी निशानदेही पर ही

हो सकता है कुछ

यह काग़ज़ी घोड़ा

बदल सकता है

अपनी शक्लोसूरत

बशर्ते

तुम छोड़ सको अपनी दरुही आदत

ललचाना छोड़ दो बड़े-बड़ेां के

आश्वासनों की आसवित अंगूरी पर

छुटभैयों के देसी ठर्रे पर

और,लगा सको

काग़ज़ी घोडे की पीठ पर

एक ज़ोरदार ठप्पा

 

सुना नहीं!

कि फिर से

हो रही है रेस

चलो फिर से मैदान में

लेकिन होशोहवास में

अबकी नोचना नहीं अयाल

गिरना नहीं पीठ से

अबकी तो बिल्कुल भी आना नहीं है

सट्टे बाजों की चाल में

 

हे दरुही जनता!

अबकी तो बिल्कुल भी मरना नहीं है

किसी अंगूरी या देसी ठर्रे से

भले ही टिकना नहीं मैदान में

पर, बिकना तो कतई नहीं!!

1 blogger-facebook:

  1. क्या बात है.. लोकतन्त्र (हमारे वाला) का सच्चा प्रतिरूप..

    उत्तर देंहटाएं

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