बुधवार, 13 अप्रैल 2011

राकेश शर्मा की कविता : खोज जारी है....

गूगल अर्थ पर खोज रहा हूँ,

बचपन का वो की विस्मृत गलियाँ

आकाश की नज़र से

देख रहा हूँ कि कहीं कोई

दिख जाए चिरपरिचित पगडंडी

कोई घरौंदा अब भी समय की रेत पर

सलामत हो शायद कहीं......

 

जीवन के तीव्रता से कटते मोडों पर

गाँव की नदी के मोड पर

बरगद की छाहं बड़ी याद आती है...

फ़ेसबुक पर सर्च करता हूँ

बिछड़े दोस्तों के नाम

कि कहीं शायद कोई मुझसा भी तनहा

खोज रहा हो रेत पर सीपियों को यहीं कहीं..

 

धुंधलाते कॉलेज के दोस्तों के चेहरे

वो चहक, निश्छल ठहाकों से सोंधी शामें

मन स्कैन नहीं कर पाता हूबहू अब उसे

बुढिया के झोंपड़े सा उपेक्षित

अपने कस्बे से दूर यहाँ

बैठा हूँ एकदम अकेले

ओढ़ी हुई मुस्कान लिए

सदभावना और सलीके से

धन दौलत इज्ज़त शोहरत के द्वीप में

सर्च इंजनों के जंगल के बीच

उस शै से दूर

लोग जिसे जिंदगी कहते थे कभी.....

--

डॉ॰ राकेश शर्मा
हिंदी अधिकारी
रा.स.वि.सं.
दोना पावला, गोवा

1 blogger-facebook:

  1. amita kaundal2:05 am

    बुढिया के झोंपड़े सा उपेक्षित
    अपने कस्बे से दूर यहाँ
    बैठा हूँ एकदम अकेले
    ओढ़ी हुई मुस्कान लिए
    bahut sunder kavita hai dil ko chhoo gai sach kah rahe hain aap
    badhai
    amita

    उत्तर देंहटाएं

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