मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

सुनील संवेदी की कविता - आदमी भी रोता है

आदमी भी रोता है

सैकड़ों किताबें, अखबार पढ़ डाले।

असंख्‍य कहानियां , कविताएं निबंध पी डाले।

बेतादाद परिचर्चाओं के कोने सीधे कर लिए।

अन्‍य भी बहुत कुछ खोजा,

तब जाना कि-

औरत की स्‍वर रहित आह के

भीतर से भी भीतर अनंत गहराई मे पहुंचकर

कितना सहज हो जाता है

आदमी की आवाज सहित

सिसकियों को खो देना।

 

सभी को दिखती है

आदमी की ओर उठी

औरत की-

एक संभावित, अपुष्‍ट पीड़ायुक्‍त

उंगली तक, सिर्फ।

 

परंतु-

एक आदमी की

आकाश की असीमितता नापता

सफेद चेहरा,

उस पर जड़ीं

दो मुरझाई आंखें

पीड़ा की फंफूदी चूसते

जर्द होंठ,

दुर्भाग्‍य की पराकाष्‍ठा से जूझतीं

माथे की लकीरें

सांसारिक व्‍यथा- व्‍याकुलता के

असहनीय भार से

दिन व दिन घटता जाता, आदमी

और हां-

औरत की ही ओर उठे

दोनों बेजान हाथ तक

नहीं दिखते किसी को।

 

पूछा, तो कह दिया-

आदमी भी कोई

देखने की चीज है।

आदमी भी कोई

कहानी, कविताओं, परिचर्चाओं का विषय है।

 

पढ़ते नहीं किताबें, अखबार

कहानी, कविताएं, समाचार

औरत मात्र को ही रूलाया जाता है।

औरत मात्र को ही रोना आता है।

औरत मात्र ही सहती है,

सुलग सुलग जलती है।

आदमी का रोना, रोना नहीं

हंसने का पूर्वाभ्‍यास है।

 

अब-

मान भी लो भाई,

आदमी भी रोता है

कई बार-

औरत से थी अधिक।

--

 

सुनील संवेदी

उप संपादक

हिंदी दैनिक जनमोर्चा बरेली।

bhaisamvedi@gmail.com

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