शनिवार, 2 अप्रैल 2011

महेन्‍द्र मिहोनवी की ग़ज़लें

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एक

हर प्राणी का सोच और मन एक नही हो सकता,

चींटी औ हाथी का जीवन एक नही हो सकता

 

वे तरने के लिए उपासे अपने घर में फांके

उनका और हमारा दर्शन एक नही हो सकता

 

वे धन पशुओं के चमचे हम मेहनतकश बलिदानी

उनका और हमारा लेखन एक नहीं हो सकता

 

वे कहते संसार दुखी है चलो मान लेते हैं

किन्‍तु सभी के दुख का कारण एक नही हो सकता

 

इस कोरे आदर्शवाद का कुछ औचित्‍य नहीं है

शेर और बकरी का आंगन एक नहीं हो सकता

 

दो

हम कहते पहले मानव है तुम कहते पहले पत्‍थर है

हम कहते सच्‍ची है दुनिया तुम कहते जादूमंतर है

 

हम कहते हैं रोटी पानी तुम कहते हो सुरा सुंदरी

हम कहते हैं श्रमिक सनातन तुम कहते बिस्‍तर है

 

तुम्‍हे व्‍यवस्‍था से कुछ शिकवे, मगर हमे नफरत है इससे

तुम कहते हो कुछ कमियां हैं हम कहते हालत बदतर है

 

तुम कहते हो दूर गगन में सभी समस्‍यायें निपटेंगी

हम कहते हैं धरती पर ही सारे प्रश्‍नों के उत्‍तर हैं

 

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महेन्‍द्र मिहोनवी

जन्‍म- सन्‌ 1965 की बरसात में चम्‍बल के ग्राम मिहोना में

शिक्षा- उच्‍च माध्‍यमिक

प्रकाशन- कुछ ग़ज़ल फुटकर रूप से यत्र तत्र प्रकाशित

सम्‍प्रति- मेहनत मजदूरी

सम्‍पर्क-कन्‍या शाला के पास, ग्राम मिहोना जिला भिण्‍ड म0प्र0

1 blogger-facebook:

  1. महेन्द्र को मैं दूसरा अदम गोंडवी कहता हूं। आप ही बताइए क्या में गलत हूं?

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