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कहानी संग्रह : इक्कीसवीं सदी की चुनिंदा दहेज कथाएँ - (7) आप ऐसे नहीं हो

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अनुक्रमणिका1 -एक नई शुरूआत - डॉ0 सरला अग्रवाल
2 -बबली तुम कहाँ हो -- डॉ0 अलका पाठक
3 -वैधव्‍य नहीं बिकेगा -- पं0 उमाशंकर दीक्षित
4 - बरखा की विदाई -- डॉ0 कमल कपूर
5- सांसों का तार -- डॉ0 उषा यादव
6- अंतहीन घाटियों से दूर -- डॉ0 सतीश दुबे
7 -आप ऐसे नहीं हो -- श्रीमती मालती बसंत
8 -बिना दुल्‍हन लौटी बारात -- श्री सन्‍तोष कुमार सिंह
9 -शुभकामनाओं का महल -- डॉ0 उर्मिकृष्‍ण
10- भैयाजी का आदर्श -- श्री महेश सक्‍सेना
11- निरर्थक -- श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्‍ठ
12- अभिमन्‍यु की हत्‍या -- श्री कालीचरण प्रेमी
13- संकल्‍प -- श्रीमती मीरा शलभ
14- दूसरा पहलू -- श्रीमती पुष्‍पा रघु
15- वो जल रही थी -- श्री अनिल सक्‍सेना चौधरी
16- बेटे की खुशी -- डॉ0 राजेन्‍द्र परदेशी
17 - प्रश्‍न से परे -- श्री विलास विहारी (7) आप ऐसे नहीं होश्रीमती मालती बसंतहरीश ने जैसे ही मानसिक चिकित्‍सालय के परिसर में कार रोकी, कुछ महिलायें दौड़ती हुई आयीं, एक महिला चढ़कर कार के बोनट पर बैठने लगी, एक उसके कांच पर हाथ फेरने लगी, कोई दूर से ही कार को देखकर ताली बजाने लगी। उन विक्षिप्‍त महिलाओं की इस स्‍थिति को देखकर हरीश का मन दु…

कहानी संग्रह : इक्कीसवीं सदी की चुनिंदा दहेज कथाएँ - (6) अंतहीन घाटियों से दूर

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अनुक्रमणिका1 -एक नई शुरूआत - डॉ0 सरला अग्रवाल
2 -बबली तुम कहाँ हो -- डॉ0 अलका पाठक
3 -वैधव्‍य नहीं बिकेगा -- पं0 उमाशंकर दीक्षित
4 - बरखा की विदाई -- डॉ0 कमल कपूर
5- सांसों का तार -- डॉ0 उषा यादव
6- अंतहीन घाटियों से दूर -- डॉ0 सतीश दुबे
7 -आप ऐसे नहीं हो -- श्रीमती मालती बसंत
8 -बिना दुल्‍हन लौटी बारात -- श्री सन्‍तोष कुमार सिंह
9 -शुभकामनाओं का महल -- डॉ0 उर्मिकृष्‍ण
10- भैयाजी का आदर्श -- श्री महेश सक्‍सेना
11- निरर्थक -- श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्‍ठ
12- अभिमन्‍यु की हत्‍या -- श्री कालीचरण प्रेमी
13- संकल्‍प -- श्रीमती मीरा शलभ
14- दूसरा पहलू -- श्रीमती पुष्‍पा रघु
15- वो जल रही थी -- श्री अनिल सक्‍सेना चौधरी
16- बेटे की खुशी -- डॉ0 राजेन्‍द्र परदेशी
17 - प्रश्‍न से परे -- श्री विलास विहारी (6) अंतहीन घाटियों से दूरडॉ0 सतीश दुबेबेड रुम के पलंग पर धंसी पड़ी तनु ने बाहर के कमरे से आने वाली तेज आवाजों से परेशान होकर कानों को जोरों से भींच लिया, पर आवाजें कानों के पर्दे चीरने पर तुली थीं। वह अनजाने ही सोचने लगी, सुनने की चाह नहीं होने पर भी कुछ आवाजें बलात क्‍यों असर डालना चाहती हैं, उस…

कहानी संग्रह : इक्कीसवीं सदी की चुनिंदा दहेज कथाएँ - (5) साँसों का तार

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अनुक्रमणिका1 -एक नई शुरूआत - डॉ0 सरला अग्रवाल
2 -बबली तुम कहाँ हो -- डॉ0 अलका पाठक
3 -वैधव्‍य नहीं बिकेगा -- पं0 उमाशंकर दीक्षित
4 - बरखा की विदाई -- डॉ0 कमल कपूर
5- सांसों का तार -- डॉ0 उषा यादव
6- अंतहीन घाटियों से दूर -- डॉ0 सतीश दुबे
7 -आप ऐसे नहीं हो -- श्रीमती मालती बसंत
8 -बिना दुल्‍हन लौटी बारात -- श्री सन्‍तोष कुमार सिंह
9 -शुभकामनाओं का महल -- डॉ0 उर्मिकृष्‍ण
10- भैयाजी का आदर्श -- श्री महेश सक्‍सेना
11- निरर्थक -- श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्‍ठ
12- अभिमन्‍यु की हत्‍या -- श्री कालीचरण प्रेमी
13- संकल्‍प -- श्रीमती मीरा शलभ
14- दूसरा पहलू -- श्रीमती पुष्‍पा रघु
15- वो जल रही थी -- श्री अनिल सक्‍सेना चौधरी
16- बेटे की खुशी -- डॉ0 राजेन्‍द्र परदेशी
17 - प्रश्‍न से परे -- श्री विलास विहारी 5 - साँसों का तारडॉ. उषा यादवमौत दबे पाँव आगे बढ़ रही थी। कोई पदचाप नहीं, फिर भी आगमन के स्‍पष्‍ट संकेत। इतनी संगदिल क्‍यों होती है मौत? न समय-कुसमय देखती है, न पात्र-कुपात्र। जब जी चाहा, मुँह उठाया और चल पड़ी। जिसे जी चाहा, अपने पंजों में दबाया और चील की तरह ले उड़ी। इमरजेंसी वार्ड के बैड नं. पा…

कहानी संग्रह : इक्कीसवीं सदी की चुनिंदा दहेज कथाएँ - (4) बरखा की विदाई

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अनुक्रमणिका1 -एक नई शुरूआत - डॉ0 सरला अग्रवाल
2 -बबली तुम कहाँ हो -- डॉ0 अलका पाठक
3 -वैधव्‍य नहीं बिकेगा -- पं0 उमाशंकर दीक्षित
4 - बरखा की विदाई -- डॉ0 कमल कपूर
5- सांसों का तार -- डॉ0 उषा यादव
6- अंतहीन घाटियों से दूर -- डॉ0 सतीश दुबे
7 -आप ऐसे नहीं हो -- श्रीमती मालती बसंत
8 -बिना दुल्‍हन लौटी बारात -- श्री सन्‍तोष कुमार सिंह
9 -शुभकामनाओं का महल -- डॉ0 उर्मिकृष्‍ण
10- भैयाजी का आदर्श -- श्री महेश सक्‍सेना
11- निरर्थक -- श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्‍ठ
12- अभिमन्‍यु की हत्‍या -- श्री कालीचरण प्रेमी
13- संकल्‍प -- श्रीमती मीरा शलभ
14- दूसरा पहलू -- श्रीमती पुष्‍पा रघु
15- वो जल रही थी -- श्री अनिल सक्‍सेना चौधरी
16- बेटे की खुशी -- डॉ0 राजेन्‍द्र परदेशी
17 - प्रश्‍न से परे -- श्री विलास विहारी (4) बरखा की विदाई डॉ. कमल कपूरऔर अंततः बरखा विदा हो गई। पर वह इस तरह विदा होगी न कभी सोचा था वसुधा ने और न कभी चाहा था। ‘विदा', विदाई और ‘विछोह कितने अजीब शब्‍द हैं न ये......अलगाव के दर्द से लिपटे हुए, फिर भी बेटी की विदाई एक ऐसा स्‍वप्‍न है, जिसे हर माँ, चाहे वह अमीर हो, चाहे गरीब, बेटी के …

कहानी संग्रह - इक्कीसवीं सदी की चुनिंदा दहेज कथाएँ - (3) वैधव्य नहीं बिकेगा

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अनुक्रमणिका1 -एक नई शुरूआत - डॉ0 सरला अग्रवाल
2 -बबली तुम कहाँ हो -- डॉ0 अलका पाठक
3 -वैधव्‍य नहीं बिकेगा -- पं0 उमाशंकर दीक्षित
4 - बरखा की विदाई -- डॉ0 कमल कपूर
5- सांसों का तार -- डॉ0 उषा यादव
6- अंतहीन घाटियों से दूर -- डॉ0 सतीश दुबे
7 -आप ऐसे नहीं हो -- श्रीमती मालती बसंत
8 -बिना दुल्‍हन लौटी बारात -- श्री सन्‍तोष कुमार सिंह
9 -शुभकामनाओं का महल -- डॉ0 उर्मिकृष्‍ण
10- भैयाजी का आदर्श -- श्री महेश सक्‍सेना
11- निरर्थक -- श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्‍ठ
12- अभिमन्‍यु की हत्‍या -- श्री कालीचरण प्रेमी
13- संकल्‍प -- श्रीमती मीरा शलभ
14- दूसरा पहलू -- श्रीमती पुष्‍पा रघु
15- वो जल रही थी -- श्री अनिल सक्‍सेना चौधरी
16- बेटे की खुशी -- डॉ0 राजेन्‍द्र परदेशी
17 - प्रश्‍न से परे -- श्री विलास विहारी (3) वैधव्‍य नहीं बिकेगापं0 उमाशंकर दीक्षितपूर्व मंत्री सेवकराम घर में मसनद के सहारे बैठे थे। उनके सामने आर्य समाज के मंत्री और सामूहिक विधवा-विवाह समिति के संयोजक पं. हर्षवर्धनशास्‍त्री विराज मान थे। सेवकराम जबसे एम.एल.ए. का चुनाव हारे हैं, तब से पूरे पाँच माह के निरन्‍तर विश्राम के बाद आज शास्‍त…

कहानी संग्रह - इक्कीसवीं सदी की चुनिंदा दहेज कथाएँ - (2) बबली तुम कहाँ हो?

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1 -एक नई शुरूआत - डॉ0 सरला अग्रवाल
2 -बबली तुम कहाँ हो -- डॉ0 अलका पाठक
3 -वैधव्‍य नहीं बिकेगा -- पं0 उमाशंकर दीक्षित
4 - बरखा की विदाई -- डॉ0 कमल कपूर
5- सांसों का तार -- डॉ0 उषा यादव
6- अंतहीन घाटियों से दूर -- डॉ0 सतीश दुबे
7 -आप ऐसे नहीं हो -- श्रीमती मालती बसंत
8 -बिना दुल्‍हन लौटी बारात -- श्री सन्‍तोष कुमार सिंह
9 -शुभकामनाओं का महल -- डॉ0 उर्मिकृष्‍ण
10- भैयाजी का आदर्श -- श्री महेश सक्‍सेना
11- निरर्थक -- श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्‍ठ
12- अभिमन्‍यु की हत्‍या -- श्री कालीचरण प्रेमी
13- संकल्‍प -- श्रीमती मीरा शलभ
14- दूसरा पहलू -- श्रीमती पुष्‍पा रघु
15- वो जल रही थी -- श्री अनिल सक्‍सेना चौधरी
16- बेटे की खुशी -- डॉ0 राजेन्‍द्र परदेशी
17 - प्रश्‍न से परे -- श्री विलास विहारी (2) बबली तुम कहाँ हो ? डॉ0 अलका पाठकआज बस में बबली की सास मुझे मिली थीं। मिली नहीं मेरे पीछे बैठी थीं। बबली की सास और एक न जाने कौन महिला। हो सकता है बबली की सास की बहन अथवा ननद हो। सास उन्‍हें कह रही थीं ‘जिज्‍जी'। सो, दोनों में से कुछ भी होना सम्‍भव है। तो बबली की सास और जिज्‍जी। अब दिल्‍ली…

कहानी संग्रह : इक्‍कीसवीं सदी की चुनिंदा दहेज कथाएँ - (1) एक नई शुरूआत

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भूमिका कहानी गद्य साहित्‍य की एक छोटी और अत्‍यन्‍त सुसंघटित व अपने में पूर्ण कथारूप है। न जाने कितने रूपों में कहानी मानव जीवन के प्रत्‍येक क्षेत्र, और प्रत्‍येक काल में घुली मिली रहती है। हममें से प्रत्‍येक व्‍यक्ति प्रतिदिन सैकड़ों कहानियों से रूबरू होता है।

कहानी की परम्‍परा अत्‍यन्‍त प्राचीन है। कहानी, अकहानी, नई कहानी, दलित कहानी आदि अनेक रूपों में कहानी लिखी गई और कहानी के विभिन्‍न रूपों को लेकर अनेक आन्‍दोलन भी चले।

देशकाल एवं वातावरण के अनुरूप कहानी के रूपों में परिवर्तन होता ही रहता है। प्राचीन काल में धार्मिक आचार, आध्‍यात्‍मिक तत्‍व-चिंतन एवं नीतिपरक कहानियों की प्रमुखता रही फिर राजा-महाराजाओं के शौर और प्रेम, ज्ञान और न्‍याय, वैराग्‍य आदि पर कहानियाँ लिखी गईं।

चरित नायकों एवं युग-प्रेम की स्‍वाभाविक प्रवृतियों के कारण कथा-साहित्‍य की परम्‍परा का निरन्‍तर विकास होता रहा है। हिन्‍दी के रीतिकाल तक कहानी में प्रेम की प्रवृति देखी गई किन्‍तु हिन्‍दी के वर्तमान काल में कहानी के नये-नये रूप देखने को मिलते हैं जो अति भौतिकतावादी, आपाधापी से पूर्ण युग के यथार्थ के खुरदरे धरातल के द…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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