रविवार, 1 मई 2011

हिमकर श्‍याम की मजदूर दिवस विशेष कविता - मत छीनो मुझसे बचपन

त छीनो मुझसे बचपन

 

कुली हैं, मजदूर हैं

बेबस हैं, मजबूर हैं

पग-पग पर संताप

जीवन लगे अभिशाप

 

न आंसू, न मुस्‍कान

खुशियों से अनजान

किस्‍मत ने मुंह फेरा

बस दुखों का बसेरा

 

छूटा मां का आंचल

छूट गया घर-आंगन

समय की कैसी चाल

अभावों का है जंजाल

 

अंधेरी गंदी बस्‍ती में

अभाव की कश्‍ती में

ईंटों का खिलौना है

कांटों का बिछौना है

 

कैसे होगा नव निर्माण

अनसुनी रही दास्‍तान

कोई संवारे अब जीवन

मत छीनो मुझसे बचपन।

 

हिमकर श्‍याम

द्वारा ः एन. पी. श्रीवास्‍तव

5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,

रांचीः 8, झारखंड।

3 blogger-facebook:

  1. कैसे होगा नव निर्माण

    अनसुनी रही दास्‍तान

    कोई संवारे अब जीवन

    मत छीनो मुझसे बचपन।

    सटीक प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  2. ह्रदय विदारक , मर्म स्पर्शी एवं वास्तविक चित्रण | सराहनीय प्रयास| बाल श्रमिक पुनर्वासन परियोजना, रांची के समस्त कार्यकर्ताओं के तरफ से हार्दिक बधाईयां !

    उत्तर देंहटाएं
  3. deepa krishna7:24 pm

    bahut achhi kavita hai..dil ko chhune wali...

    उत्तर देंहटाएं

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