रविवार, 1 मई 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव के बालगीत

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बस्ता

बस्ता कितना भारी है
भरी हुई लाचारी है|

गठरी कंधे पर लादे
लगता कोई व्यापारी है|

सराबोर पानी से है
बदली कारी कारी है|

कमर झुक गई है कैसी
बस्ते की बीमारी है|

उस छोटे से बस्ते में
उसकी दुनिया दारी है|

गुल्ली तो अभ्यस्त हुई
अब अम्मू की बारी है|

कापी और किताब हुई
अब भाजी और तरकारी है|

कोई भला क्या समझाये
हुक्म‌ हुआ स‌र‌कारी है|

ज‌ग‌ह‌ ज‌ग‌ह‌ अब‌ हिंदी प‌र‌
अंग्रेजी ही भारी है|

य‌ही व्य‌व‌स्था चालू है
य‌ही व्य‌व‌स्था जारी ह‌ै|

 

--

मेरा घर

             मेरा घर है बड़ा महान‌

             कितना सुंदर बना मकान‌
             आगे सुंदर खड़ी पहाड़ी
             पीछे दिखता बड़ा ढलान|

             दो मंजिल का घर है मेरा
             नीचे दादा दादी रहते
             ऊपर है पापा का डेरा
             घर् के भीतर आने से ही
             मिट जाती संपूर्ण थकान|

            ड्राइंग रूम है इतना अच्छा
             जिसमें टी वी बड़ा रखा है
             जिसको देखे बच्चा बच्चा
             कमरे में सब बच्चे फिरते
             पहने चड्डी और बनियान|

            बाजू वाले बड़े रुम‌ में
            चाचा मस्ती में सोते हैं
            हिलमिलकर रहते हज़ूम में
            वे अक्सर कहते रहते हैं
            मेरा घर है मेरी जान|

            स्वागत मेहमानों का होता
            सारा घर सिर आंखों लेता
            जैसे भगवानों का होता
            सारे अथिति यही कहते हैं
            मेरा घर है बड़ा महान|

            दादी वाले बड़े हाल में
            रोज रामजी भोजन करते
            पूजा वाली बड़ी थाल में
            दादी ने लिक्खा तखती पर‌
            मॆरा घर है मेरी शान|

            मम्मी पापा चाची चाचा
            दादा के आदेश मानते
            सबका जनम जनम का नाता
            जो भी इस घर में रहता है
            उसका सदा हुआ उत्थान

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1 blogger-facebook:

  1. बहुत खूब।
    पहली कविता में....

    अब भाजी और तरकारी है|

    ..भाजी-तरकारी से ही काम चल जाता । 'और' अधिक लग रहा है।

    उत्तर देंहटाएं

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