सोमवार, 2 मई 2011

अनन्‍त आलोक के तीन मुक्तक

 

मुक्‍तक

1

अब आदमी व्‍यापार की चीज हो गया है

रिश्तों का अब यहां निर्बीज हो गया है

बेचकर खा रहा अब आदमी को आदमी

कर्म इसका आसुरी तहजीब हो गया है।

2

अब आदमी का इक नया प्रकार हो गया

आदमी का आदमी शिकार हो गया

जरुरत नहीं आखेट को अब कानन गमन की

शहर में ही गोश्‍त का बाजार हो गया ।

3

खुदा की एक खूबसूरत नेमत हैं बच्‍चे

आदमी के प्‍यार की हकीकत हैं बच्‍चे

ये बच्‍चे न गर होते लगता आंगन सूना सूना

खुशियों के चमन खिलते जहां होते हैं बच्‍चे

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