बुधवार, 4 मई 2011

शेरसिंह की लघुकथा - सांझीदारी

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वे तीनों सगे भाई थे। तीनों में वह मंझला था। उम्र पैंतालीस के आस -पास। उस की एक ही संतान थी, वह भी लड़की। उस की भी शादी कर दी थी। तीनों भाई वैसे खाते -पीते घर के थे। थे अंगूठा छाप, पर दुनियादारी और अनुभव में पके, कढ़े हुए। जमीन- जायदाद अच्‍छी थी। इसलिए बहुत अच्‍छी गुजर -बसर हो जाती थी। पहाड़ी क्षेत्रों में वैसे भी थोड़ी सी जमीन भी पर्याप्‍त मानी जाती है।

उस की बीवी बीमार चल रही थी। दुर्भाग्‍य, उस की बीवी की अकाल मृत्‍यु हो गई। वह खूब रोया पीटा। लेकिन उस की बीवी उसे मंझधार में ही उसे छोड़ कर चली गई थी। एक वर्ष उसे गमी में बीत गया।

समय का चक्‍कर चलता रहा 1 उस की बीवी को गुजरे अब दो - तीन साल हो गए थे। इस बीच कभी वह बड़े भाई के पास रहता, कभी छोटे भाई के पास। जब कभी उसे अपनी स्‍वर्गवासी बीवी की याद आती, तो वह भाइयों के घरों में जा कर भूलने की कोशिश करता। उसे अभी काफी लम्‍बी उम्र काटनी थी। वह सोचता कैसे समय कटेगा, रंडवा रहते -रहते। तीनों भाइयों में से उस के पास जमीन - जायदाद भी अधिक थी। एक ट्रैक्‍टर भी था उस के पास।

वह अधिकतर छोटे भाई के घर में ही जाता था। छोटे भाई की बीवी उसे आदर भी देती थी, और वह उसे अच्‍छी भी लगती थी। कभी -कभी वह उस से हंसी -ठठा भी कर लेती थी। आंखों में आंखें डाल कर बातें भी करती। उस पर अधिकार भी जताती थी।

बहुत दिनों से उस के अंदर एक बात चक्‍कर काट रही थी। लेकिन वह डरता था कैसे अपने छोटे भाई से इसे कहूंगा। पर, एक दिन उस ने छोटे भाई से पूछ ही लिया –

" देख किशनु … मेरे पास जमीन जायदाद है, ट्रैक्‍टर भी है। पर मैं अकेला रहता हूं। कभी तुम्‍हारे घर पड़ा रहता हूं, कभी बड़े भाई के घर में। अगर तुम कहो तो मैं तुम से एक बात पूछना चाहता हूं।"

" क्‍या बात है ?"

" लेकिन पहले तुम हां कहो तो मैं कहूं।"

" बात को बिना जाने समझे मैं कैसे हां कहूं … पहले बात तो बताओ।"

" किशनु ! देख… मैं अकेला रहता हूं। अगर तूम चाहो तो मैं भी तुम्‍हारे ही घर रहूंगा।

जमीन वगैरह तो नहीं। लेकिन ट्रैक्‍टर में तुम भी बराबर के हिस्‍सेदार हो जाओगे।"

" कैसे ?" छोटे भाई ने हैरान हो कर पूछा।

" मैं ट्रैक्‍टर तुम्‍हारी बीवी के नाम कर दूंगा। पर, तुम्‍हें भी मेरे लिए कुछ करना होगा।"

" क्‍या … क्‍या करना होगा मुझे ?"

" तुम्‍हें अपनी बीवी में मेरे लिए भी हिस्‍सा देना होगा।"

" क्‍या …? " छोटा भई क्रोध से भडक उठा।

" गुस्‍से की बात नहीं …मैं ट्रैक्‍टर तुम्‍हारी बीवी के नाम कर दूंगा। वह आराम से बोला।

अब वह अपने छोटे भाई के घर में ही रहता है। ट्रैक्‍टर उस ने अपने भाई की बीवी के नाम कर दिया है। वह अब दोनों भाइयों का ध्‍यान रखती है।

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O शेर सिंह

अनिकेत अपार्टमेंट, प्‍लाट नं. 22

गिट्टीखदान लेआउट, प्रतापनगर

नागपुर - 440 022

E-Mail: shersingh52@gmail.com

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