रविवार, 8 मई 2011

हिमकर श्‍याम की कविता - माँ

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माँ

जाड़े की ठिठुरन में धूप लगे माँ

अनवरत सहन का प्रतिरूप लगे माँ

तपती दुपहरी में ठंडी बयार लगे माँ

इंद्र की बगिया का हरसिंगार लगे माँ

सुहागिन के माथे की सिंदूर लगे माँ

पूजा की थाली में रखी दूब लगे माँ

व्रती के हाथों में सजा सूप लगे मां

बिन तीरथ-धाम की देवी रूप लगे माँ

गीली अंगीठी की हर फूँक लगे माँ

कोंपलों से उठी खुशियों की कूक लगे माँ

मरू विस्‍तार में नेह का अनुबंध लगे माँ

मन से मन को पाटती सेतुबंध लगे माँ

छिटकी चांदनी में चंदा का प्‍यार लगे माँ

ममता का अकल्‍पनीय विस्‍तार लगे माँ

हर ख्‍वाहिशों की रहगुज़र लगे माँ

तू दुआओं का एक समुन्‍दर लगे माँ

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हिमकर श्‍याम

द्वारा - एन. पी. श्रीवास्‍तव

5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,

रांचीः 8, झारखंड।

4 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर, बेहतरीन अभिव्यक्ति!

    उत्तर देंहटाएं
  2. भगवान राम ने शिव-धनुष तोड़ा, सचिन ने क्रिकेट में रिकार्ड तोड़ा, अन्ना हजारे ने अनशन तोड़ा, प्रदर्शन-कारियों रेलवे-ट्रैक तोड़ा, विकास-प्राधिकरण ने झुग्गी झोपड़ियों को तोड़ा। तोड़ा-तोड़ी की परंपरा हमारे देश में पुरानी है। आपने कुछ तोड़ा नहीं अपितु माँ की ममता से समाज को जोड़ा है। इस करुणा और ममता को बनाए रखिए। यह जीवन की पतवार है। आपकी रचना का यही सार है। साधुवाद!
    =====================
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर !!
    माँ सही में भगवान की ही एक प्रतिरूप है !!
    सभी माताओं को शत शत नमन !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut khub..Duniyan mein to ek hi hai jo apka bhala sochati hai.. apitu ye kahiye ki inka (maan)ka sthan koi nai le sakta.... apna sochane wala hota hai wo hai apni maan....

    उत्तर देंहटाएं

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