एस के पाण्डेय की लघुकथा - भाई का प्रेम

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bhai ka prem

भाई का प्रेम

रामू की पत्नी रजनी रामू से अक्सर कहीं सफर पर ले चलने को कहा करती थी। महीनों बाद उसने रामू से फिर कहा “अब तक मुझे कभी आप के साथ सफर करने का मौका नहीं मिला। मेरी दिली तमन्ना है कि कभी आपके साथ कहीं चलूँ और रास्ते में आप से बोलते-बतलाते सफर का आनन्द उठाऊं। सच में बहुत अच्छा लगेगा। आप हमेशा कोई न कोई बहाना बनाकर टालते रहते हैं। कभी घर का डर तो कभी गाँव का। मुझे मायके से लाना होता है, तो भी किसी न किसी को भेज देते हो। आज तक खुद लाने भी नहीं गए।“

रामू बोला “यह शहर तो है नहीं कि जब मन में आये तो कहीं पिकनिक पर निकल जाओ। कहीं नहीं तो कम से कम मार्केटिग कर आओ, सिनेमा चले जाओ अथवा किसी पार्क में ही थोड़ी देर घूम आओ। यहाँ घर वालों से ज्यादा डर बाहर वालों का लगता है। गाँव वाले तरह-तरह की बातें करने लगते हैं।“

रजनी बोली “ कितनी बार सुनाओगे यह कहानी। बहुत सुन चुकी हूँ।“ रामू बोला “कोशिस करूँगा कि तुम्हारी यह इच्छा जल्दी ही पूरी कर दूँ।“

रामू मौका तलाशता रहा और आखिरकार रजनी को खुश करने के लिए प्रोग्राम बना लिया। रजनी मायके गई हुई थी। उसे लाने पहुँच गया। लेकिन सात घंटे का सफर यूँ ही बीत गया। रजनी रामू से दो–चार बातें मुश्किल से ही कर सकी । उसे रामू से बात करने का समय ही नहीं मिला। क्योंकि ट्रेन की उसी बोगी में उसका सगा नहीं सही पर ममेरा भाई मिल गया था।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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