एस. के. पाण्डेय की कविता - धरा का धैर्य

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धरा का धैर्य

(१)

ताल, नदी व कुएँ आदि सब दिन-दिन सूखे जाते हैं ।

पशु-पक्षी पीने को पानी मुश्किल से ही पाते हैं ।।

धीरे-धीरे जलस्तर नीचे गिरता जाता है ।

शहरों और बस्तियों में जल, पीने को नहीं मिल पाता है ।।

 

(२)

पेड़ बहुत से खुद ही खुद दिन-दिन सूखे जाते हैं ।

जो बचते कटते जाते पशु-पक्षी ठौर न पाते हैं ।।

जल, हवा आदि जो भी मिलता उनमें प्रदूषण होता है ।

वातावरण में नाना विकिरण लगाती हर पल गोता है ।।

 

(३)

सूखा कहीं तो बाढ़ कहीं, कहीं सुनामी आती है ।

कहीं भू-स्खलन कहीं भूकम्प ज्वालामुखी फट जाती है ।।

जाड़े के मौसम में भी अब ठंढ़ी ज्यादा न पड़ती है ।

वर्षा भी कम होती जाती गर्मी दिन-दिन बढ़ती है ।।

 

(४)

हमारे पूर्वज कहते थे जगने वाले ही पाते हैं ।

सोने वाले रोते क्योंकि ये खोते ही जाते हैं ।।

सारे के सारे हम सोते कुछ भी नहीं बूझता है ।

कोई माने न माने अब धरा का धैर्य टूटता है ।।

 

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.) ।

http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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