विजय वर्मा की कविता - दुश्मन के दोस्त

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अमेरिका ९/११ और २६/११ को अलग-अलग ढंग से देखता है.
उसे हिंदुस्तान की धरती पर आतंकवादियों द्वारा बहाया हुआ खून  

नज़र नहीं आता .
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दुश्मन के दोस्त -- 

 

दुश्मन के दोस्तों से  उम्मीद  कैसी? 

जो जगे है,उन्हें जगाने की ज़िद कैसी? 

 

हर हादसों  के गवाह वे खुद भी तो थे 

फिर तहकीकात क्या तस्दीक कैसी?

 

हमें है अपना वतन प्यारा,उसे छेड़ा तो 

उनकी मिटटी क्या,मिटटी पलीद कैसी ?

 

लाखो सपने है आँखों में ,सच है मगर 

दुसमन हो सर पे तो सपने क्या, नींद कैसी?,

 

बहुत सबूत सौपें,बहुत उच्च-स्तरीय  बैठके की             

अब हो सीधी कार्यवाई ,अब ताक़ीद कैसी?

 

जिसे पूजना हो पूजो,इबादत करो किसी की 

बात वतन की हो तो ,मंदिर क्या ?मस्जिद कैसी ?

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3 टिप्पणियाँ "विजय वर्मा की कविता - दुश्मन के दोस्त"

  1. बात वतन की हो तो मंदिर क्या मस्जिद कैसी।

    बेहतरीन ख़यालात वर्मा जी को मुबारकबाद।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सही कहा है| लेकिन बात-बात का खेल भी चलता रहता है, जरुरी है की बातें आँख में आँख डाल कर की जाएँ |

    उत्तर देंहटाएं
  3. धन्यवाद् दानी साहब,और मिश्राजी की बात भी सही है कि
    बाते आँखों में आँखे डाल की जाए,वर्ना तो पिद्दी जैसे देश
    भी धमका देते है.

    उत्तर देंहटाएं

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