सोमवार, 23 मई 2011

अमिता कौंडल की कविता - आज

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आज

गंतव्य की ओर अग्रसर
व्याकुलता, उत्तेजना और
मानसिक संवेदना संग
लद मैं भागी जा रही थी
कि तभी अंतर्मन पुकारा
इन दिशाहीन कदमों से
इस सांसारिक भेड़चाल
में तुम किस ओर रही हो?


भविष्य के भव्य सुनहरी
महलों की चंचल चाह में
अपने वर्तमान को तुम
क्यों खंडहर बना रही हो?

 
जरा रुको, ठहरो, सोचो
पूछो अपने आप से तुम
क्या क्या खो कर
क्या पाओगी?
कल सुंदर व् अच्छा होगा
इसी लालसा में अपना
क्यों तुम आज गंवा रही हो


पर कल जब आएगा तब
तुम समझोगी
जो बीत गया वो अच्छा था
इसीलिए बीते कल को तुम
भूल कर और
आने वाले कल की तुम
फ़िक्र छोड़ कर
आज को जियो, जी भर के जियो

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डॉ. अमिता कौंडल

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चित्र - ज्ञानेन्द्र टहनगुरिया की कलाकृति

6 blogger-facebook:

  1. इसीलिए बीते कल को तुम
    भूल कर और
    आने वाले कल की तुम
    फ़िक्र छोड़ कर
    आज को जियो, जी भर के जियो

    सार्थक बात कहती अच्छी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. भविश्य के सुनहरे महलों की चन्चल चाह में,
    अपने wअर्मान को क्यूं खंडहर बना रहे हो।

    लाज़वाब , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. अमिता कौंडल4:57 pm

    संगीता जी व् संजय जी आपके स्नेह्श्ब्दों के लए हार्दिक धन्यवाद.
    सादर,
    अमिता कौंडल

    उत्तर देंहटाएं
  4. अमिता की कविता अनेक आशाओं से भरी है । आपका सन्देश वर्तमान में जीने का है , जबकि हम आने वाले समय के लिए अपने वर्त्तमान को भी चौपट कर लेते हैं । आज का समय कल नहीं लौटेगा । इसलिए अमिता जी ने जो कहा वह सफल जीवन जीने के लिए विचारणीय और अनुकरणीय है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. पर कल जब आएगा तब
    तुम समझोगी
    जो बीत गया वो अच्छा था
    इसीलिए बीते कल को तुम
    भूल कर और
    आने वाले कल की तुम
    फ़िक्र छोड़ कर
    आज को जियो, जी भर के जियो
    amita ji jeevan darshan ki kya hi sunder baat kahi hai aapne
    sahi hai kal ke chakkar me hum aaj ko bhul jate hain
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  6. अमिता कौंडल12:53 am

    कम्बोज भैया व् रचना जी आपके सराहनीय स्नेह शब्दों के लिए हार्दिक धन्यवाद.
    सादर
    अमिता कौंडल

    उत्तर देंहटाएं

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