मंगलवार, 24 मई 2011

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - आयोगजीवी मैं

भारत आयोग प्रधान देश है। भारत का नागरिक होने के नाते मैं आयोग जीवी हूँ। आयोगजीवी वह जन्‍तु है जो आयोग के सहारे जीवित रहे। बिन आयोग सब सून।

इधर मौसम बड़ा ठण्‍डा है। आयोगों की गर्मी से कुछ ठण्‍ड दूर होने लगती है और फिर हिमालय में बर्फ गिरने के कारण शीत लहर चलने लग जाती है। आयोग अपनी सुनवाई स्‍थगित कर कहीं दूर चला जाता है। लेकिन आयोग-प्रधान देश के कण-कण में, अटक से लेकर कटक तक, काश्‍मीर से लेकर कन्‍याकुमारी तक आयोग छाया हुआ है। मैं चाहता हूं कि आयोग अपनी जांच के दौरान मुझे भी आमन्‍त्रित करें ताकि सरकारी खर्चे से दिल्‍ली घूम सकूँ। अन्‍यथा मेरे लिये दिल्‍ली बड़ी दूर की चीज है। जी हां दिल्‍ली दूर है।

वे भाग्‍यशाली हैं जिन्‍हें आयोग आमन्‍त्रित करता है। वे समझदार हैं जो आयोग में जाते हैं और ज्‍यादा भाग्‍यशाली वे लोग हैं जो आयोग में जाने से मना कर देते हैं।

मना करने वाले ये योग्‍य व्‍यक्‍ति, व्‍यक्‍तिगत स्‍वतन्‍त्रता सोचने, समझने और बोलने की आजादी की बात करते हैं। ऐसा लगता है जैसे बिल्‍ली हज को चली है। संविधान, मूल अधिकार, चरित्र हनन, आदि भारी-भारी शब्‍दों का प्रयोग कई बार मुझे अन्‍दर तल दहला देता हैं। अपन व्‍यंग्‍यकार ऐसे मजबूत, ठोस और नुकीले व्‍यक्‍तव्‍यों का आदि नहीं रहा है। इमरजेन्‍सी ने बहुत कुछ सिखा दिया।

आयोग की बैठक चल रही है, मैं दर्शक दीर्घा से श्रवण-लाभ प्राप्‍त कर रहा हूँ।

‘‘तो हम चाहते हैं कि इस प्रकार के आयोगों का गठन भविष्‍य में नहीं करना पड़े।''

‘‘यह तो हम भी चाहते हैं।'' न्‍यायमूर्ति बताते हैं ‘‘लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो न्‍याय का क्‍या होगा, हमें न्‍याय की फिक्र है।'' और न्‍याय की फिक्र में वे फाइलों में खो जाते हैं। वास्‍तव में फाइलें हमारा राष्‍ट्रीय चरित्र है।

बिना फाईल के हम कुछ नहीं कर सकते हैं। फाईलों से ही हम चक्रव्‍यूह बनाते हैं। संविधान बनाते और बिगाड़ते हैं। फाईलों के चक्रव्‍यूह में हमारे कई अभिमन्‍यु कालकवलित हो चुके हैं।

आयोग बीच-बीच में लघु शंका, दीर्धशंका, लंच सायंकालीन चाय आदि के लिए उठता बैठता है। और यह शुभ है। इससे पता लगता है कि आयोग जीवन्‍त है और जीवन्‍त आयोग से न्‍याय की आशा रखी जानी चाहिये।

आयोग की बैठक फिर चल रही है।

'अगर आपका तर्क अस्‍वीकृत कर दिया गया तो आप क्‍या करेंगे।''

‘‘मैं सरकार से सिफारिश करा दूसरा आयोग बैठाने की कोशिश करूँगा।''

‘‘और अगर आपका तर्क स्‍वीकृत कर लूँ तो।''

‘‘योर अनार, थेंक्‍यू, थेंक्‍यू वेरी मच सर।''

‘‘लेकिन आपके तर्क में वजन नहीं है।''

‘‘लेकिन तर्क तो तर्क है साहब, बिना वजन के भी तर्क चल जाता है।''

मैं दर्शक-दीर्घा से उठकर केन्‍टीन चला जाता हूँ। आयोग ने भी जांच का कार्य आगामी सोमवार तक के लिये स्‍थगित कर दिया है। पहले आयोग 3 मास में रिपोर्ट देने वाला था। इस प्रकार के लगातार स्‍थगनों से आयोग ने अपना समय 6 मास बढ़ा लिया। लगता है सरकार और विरोधी दलों के बीच एक गुप्‍त समझौता है। हम हारेंगे तो आपके खिलाफ आयोग बैठा देंगे। और आप हारें तो हमारे खिलाफ आयोग बिठा देना। लेकिन आयोग की रिपोर्ट पर कोई कार्यवाही नहीं करेंगे।

इस देश की भोली-भाली जनता को आयोग के खिलौने से खिलाया जा सकता है। खिलाया जा रहा है। और खिलाया जाता रहेगा।

वास्‍तव में आयोग विरोधी दलों के समर्थन में जो काम करता है वह जनता की याददाश्त कमजोर होने तक करता रहे, फिर कुछ साल बाद रिपोर्ट दे, और आयोग का कार्य समाप्‍त। सरकार उस रिपोर्ट को राष्‍ट्रहित में प्रकाशित नहीं करें और ऐसा ही चलता ही रहता है।

सोच रहा हूँ आज सुबह जो दाल मैंने खाई थी उसमें एक कंकर आ गया था, इस बात की जाँच मुझे एक आयोग से करानी चाहिये या नहीं।

अगर मैं शिकायत लिख कर दूँ तो क्‍या आयोग ध्‍यान देगा।

आपका क्‍या ख्‍याल है, मुझे शिकायत कर देनी चाहिये।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002 फोनः-2670596

ykkothari3@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. प्रवाहित रहे यह सतत भाव-धारा।
    जिसे आपने इंटरनेट पर उतारा॥
    =====================
    ’व्यंग्य’ उस पर्दे को हटाता है जिसके पीछे भ्रष्टाचार आराम फरमा रहा होता है।
    =====================
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

    उत्तर देंहटाएं
  2. 'आयोगजीवी' बहुत अच्छा लगा. आप जैसे श्रेष्ठ व्यंग्यजीवी को बहुत बहुत बधाई.

    कृष्ण गोपाल सिन्हा,लखनऊ.

    उत्तर देंहटाएं

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