बुधवार, 25 मई 2011

कैस जौनपुरी की कहानी - सफीना

ज्ञानेन्द्र टहनगुरिया

-“हैलो...सर आपसे मिलने सफीना आई हुई हैं बैंक से...” ये आवाज थी मेरे ऑफिस की रिसेप्शनिस्ट की. मैं न चाहते हुए भी बैंक से फोन करने वालों को मना नहीं कर पाया था. और उसका सिला ये हुआ कि सफीना नए सेविंग अकाउंट के लिए मेरे डॉक्यूमेंट्स लेने आई थी. मैंने सोचा, “लड़की आई है...डॉक्यूमेंट्स लेने...? क्या बात है...! बैंक वाले भी क्या-क्या करते रहते हैं....! पहले तो लड़कियां सिर्फ फोन पर बात करती थीं....अब पेपर्स लेने भी खुद आने लगी हैं...”

खैर...मैं बेमन से कुछ सोचता हुआ आया...और रिसेप्शन पे बैठे लोगों पर एक नज़र दौड़ाई...एक पतली सी लड़की बैठी हुई थी, लाल सोफे पे, एक किनारे...मैंने उसी से पूछा...”सफीना...?” वो मुस्कुरा कर खड़ी हो गई...मैंने आदतन हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ाया...सफीना सिर्फ देखने में छोटी सी, पतली सी लड़की लग रही थी मगर उसे सब बातें मालूम थीं कि लोग मिलते हैं तो हाथ मिलाते हैं...और मुस्कुराते हैं....

खैर तब तक मैं सफीना के चेहरे को देख चुका था...सफीना एक खूबसूरत लड़की थी...मासूम सी...फूल जैसी...कोमल...अनछुई...कच्ची कली जैसी...मगर इतनी छोटी सी उमर में मार्केटिंग जैसा जद्दोजहद वाला काम कर रही थी....

सफीना का हाथ मेरे हाथ में था और मुझे लगा जैसे मैं किसी मखमल की चादर के एक कोने को पकड़े हुए खड़ा हूँ...और चादर के मखमली अहसास को महसूस करके खुश हो रहा हूँ...फिर मैंने सफीना से कहा...”आइये...” सफीना को लेकर मैं मीटिंग रूम में आ गया...अब उस रूम में सिर्फ मैं था और सफीना थी....सफीना ने फॉर्म निकाल लिया था...और वो उसी काम के लिए आई भी थी...

सफीना अपना काम बहुत ही खूबसूरती से कर रही थी....और मैं...उसकी खुद की खूबसूरती में बार-बार खो जा रहा था...फिर जब कोई बात ऐसी होती थी जब मुझे जवाब देना होता था तब मैं वापस अपने होश में आ जाता था...और जब सफीना बोलती थी...तो मैं उसके चेहरे को एक तरफ से दूसरी तरफ नज़र घुमा कर देख ले रहा था. जब मेरी और सफीना की नज़रें मिलतीं तो थोड़ी देर के लिए मैं अपनी नज़र हटा लेता था...मगर ऐसी हालत में बहुत मुश्किल हो जाता है....अगर आपके दिमाग में कुछ और चल रहा है....... तो आप नज़र मिला के बात नहीं कर सकते...... और जब आप नज़र नहीं मिला पाते हैं........ तब इधर-उधर देखते हैं...और फिर जब सामने सफीना जैसी हसीन लड़की हो तो इधर-उधर देखना........ खुद को भी बुरा लगता है...मगर जरा सी देर के इस इधर-उधर में मैंने देख लिया था कि सफीना वाकई बहुत पतली थी...

मुझे पता नहीं उसकी उमर क्या रही होगी मगर देखने में वो बिलकुल पन्द्रह साल की एक कमसिन लड़की लगा रही थी...लेकिन वो बैंक में काम करती थी तो इतना तो तय है कि वो कुल पन्द्रह साल की तो नहीं रही होगी...मगर मेरे लिए उसकी उमर उतनी मायने नहीं रखती थी जितना कि उसका खूबसूरत चेहरा....और जैसा मेरे साथ अक्सर होता है...एक खूबसूरत चेहरा दिखा नहीं कि मैं फ़िदा....मैं सफीना के खूबसूरत चहरे पर भी फ़िदा हो गया था...सफीना का छोटा सा गोरा चेहरा ऐसा लग रहा था जैसी किसी चित्रकार की कला हो...एक पेंटिंग हो....

जब वो बोल रही थी तो उसके गुलाबी होंठ ऐसे लग रहे थे जैसे कोई फूल खिल रहा हो...उसकी पंखुडियां फ़ैल रही हों...फिर सिकुड़ जा रही हों...फिर एक खुश्बू सी बिखर रही हो...

सफीना इस नए सेविंग अकाउंट के फायदे बता रही थी...जिनमें फायदे ज्यादा थे...नुकसान बिलकुल नहीं...तो मैंने पूछा...”ऐसा क्यूँ कर रहे हो आपलोग...? इतना सबकुछ फ्री में क्यों दे रहे हो...? आप कैसे मैनेज करोगे...???” तब सफीना मुस्कुराई थी...उसने कहा....”सर ये बैंक ऑफर दे रही है...अब कुछ नया नहीं रहेगा तो कस्टमर कैसे आयेंगे...ज्यादा कस्टमर को अट्रैक्ट करने के लिए खर्चा तो करना ही पड़ेगा...” मैंने पूछा...”वसूलोगे कैसे...?” इस बार सफीना खिलखिलाकर हंसी थी...

मुझे उससे बात करके अच्छा लग रहा था...एक तरफ मेरे दिमाग में ये ख्याल आ रहा था कि “ये बैंक वाले सब अच्छा-अच्छा दिखा के बाद में चूना लगाते हैं...” दूसरी तरफ सफीना का रूहानी चेहरा देखकर मैं सबकुछ भूल जा रहा था...या यूँ कहूँ तो जानबूझकर ऐसा कर रहा था...क्योंकि सफीना के मासूम चहरे के आगे मैं कोई भी धोखा खाने को तैयार था...ज्यादा से ज्यादा क्या जाएगा...कुछ पैसे....इतना कमाया...आगे भी कमा लूँगा....

बहरहाल...सफीना ने मुझे तैयार कर ही लिया...मैं और कुछ सोच भी नहीं पा रहा था...सफीना ऐसे अकाउंट की बात कर रही थी जिसमें मुझे पच्चीस हजार रूपए कम से कम रखने पड़ेंगे...मैं ये भी सोच रहा था...”क्या मैं इतने पैसे रख पाऊंगा...?” लेकिन फिर मैंने सफीना से पूछा...”अगर किसी महीने पच्चीस हजार से कम हो गए तो...?” तो सफीना ने मुस्कुरा कर ये भी परेशानी दूर कर दी...उसने बैंक के सारे नियम-कानून बता डाले...जिसमें मुझे कोई दिलचस्पी नहीं थी...मैं तो ये अकाउंट बस सफीना के कहने पर खोल रहा था....वो जो-जो कह रही थी....मैं एक अच्छे बच्चे की तरह सारी बातें मान रहा था...कहीं दिल के भीतर से ये आवाज आ रही थी...”डरो मत...इतनी खूबसूरत लड़की धोखा नहीं दे सकती...”

उसने कहा “चेक दे दीजिए....” मैंने पूछा...”कितने का...?” उसने कहा ...”पच्चीस...” मैंने पूछा....”पूरा....?” मेरे इस बचकाने सवाल पर सफीना एक बार फिर जोर से हंसी थी....और मेरे दिल को एक तसल्ली मिल गई....उस वक्त अगर वो कहती “पचास...” तो भी शायद मैं पीछे नहीं हटता...

मैंने पच्चीस हजार का चेक भी दे दिया.... इस बार सफीना ने मेरी टांग खींची....”सर...चेक क्लियर हो जाएगा ना....?” और इतना कहते ही हम दोनों हंसने लगे...ऐसा लग रहा था जैसे हम दोनों एक-दूसरे को बहुत पहले से जानते हैं...और बहुत अच्छे दोस्त हैं...मगर ऐसा नहीं था. सफीना अभी थोड़ी देर पहले ही मुझसे मिली थी...मगर उसका बात करने का अंदाज इतना प्यारा था कि बात कुछ और ही हो रही थी....

मैंने सफीना से कह दिया...”पहली बार मैं किसी ‘सेल्स गर्ल’ से इस तरह बात कर रहा हूँ....सफीना ने अपनी सफाई में कहा....”सर...आजकल कम्पटीशन बहुत बढ़ गया है...अब आपको कुछ अलग करना पड़ता है...तब बिजनेस आगे जाता है...तभी लोग जुड़ते हैं...और एक रिलेशन बनता है...”

सफीना की बात बिलकुल सही थी...उसने अपनी बातों से एक रिश्ता बना लिया था...मेरे और अपने बीच...मुझे ये रिश्ता एक खूबसूरत रिश्ते जैसा लग रहा था...एक सेल्स गर्ल और एक अकाउंट होल्डर का रिश्ता....एक खूबसूरत रिश्ता जिसमें दोनों अपनी-अपनी पहचान भूलकर एक इंसान की तरह पेश आ रहे थे....

सफीना ने जल्दी-जल्दी फॉर्म भर दिया...और मुझे दस्तखत करने को कहा...मैंने बिना देखे-पढ़े हर जगह दस्तखत कर दिए...मुझे सफीना पर भरोसा था...क्योंकि सफीना एक बेहद खूबसूरत लड़की थी...और खूबसूरती ही मेरी कमजोरी है...मुझे कुछ दिखाई नहीं देता है...अगर मेरे सामने एक खूबसूरत चेहरा आ जाए...कई बार इस वजह से मुझे नुकसान भी होता है....लड़कियां मेरे बारे में गलत राय बना लेती हैं...कि...मैं ऐसा हूँ...मैं वैसा हूँ....लेकिन इन लड़कियों को मालूम नहीं होता है कि...मैं किस चीज पर मर रहा हूँ....

“नॉमिनी किसको बनायेंगे सर....?” ये एक अचानक सा सवाल मेरे कानों को सुनाई दिया. अब बात कुछ और हो गई थी...मैंने एक नाम बताया. सफीना ने वो नाम लिख दिया...फिर सफीना ने पूछा...”नॉमिनी से आपका क्या रिश्ता है....” थोड़ी हिचक तो हुई मगर बताना तो था...हिचक इसलिए हुई कि अभी तक हम खुलकर बात कर रहे थे...हंस रहे थे...मुझे डर लगा कहीं सफीना ये जानने के बाद कि मैं शादी-शुदा हूँ...मुझसे दूरी ना बना ले...बस इसी डर से मैं हिचक रहा था...लेकिन सफीना का दिल बहुत साफ़ था...उसके चहरे पे एक शिकन भी नहीं आई...फिर मुझे लगा...मैं बिलावजह डर रहा था...

अब सफीना के जाने का वक़्त था...लेकिन सफीना ने जाने से पहले कुछ बातें ऐसी कहीं...कि मैं कुछ सोचने पर मजबूर हो गया....सफीना ने कहा....”सर ब्रांच कौन सी रखना चाहेंगे...? आप कहाँ रहते हैं...?” मैंने कहा...”अंधेरी वेस्ट...” सफीना ने कहा...”अंधेरी वेस्ट में जे पी रोड़ पर हमारी ब्रांच है...” मैंने कहा...”हां मेरे लिए वही सही रहेगा...मेरे घर के पास भी है...” मगर सफीना ने कुछ ऐसा कहा जिसने पूरी बातचीत का रुख मोड़ दिया...उसने कहा....”लेकिन सर....मैं चाहती हूँ..कि आप अंधेरी ईस्ट ब्रांच रखिये...क्योंकि यहाँ पर मैं बैठती हूँ...कल को आपको कोई जरुरत पड़ती है तो मैं हेल्प कर सकती हूँ...और आपका अकाउंट खुलते ही मैं खुद आकर आपको ‘वेलकम किट’ दे जाउंगी...” सफीना ने सारी बातें एक सांस में कह डालीं....मेरे लिए सोचने का वक्त ही नहीं था...सफीना खुद कह रही थी...कि वो खुद आएगी...मुझसे मिलने....उसने अपना विजिटिंग कार्ड भी दिया जिस पर उसका मोबाईल नंबर भी था....सफीना बिलकुल भी झिझक नहीं रही थी...

अभी तक मैंने जितनी भी मार्केटिंग गर्ल्स को देखा है...सब सोचती हैं कि कितनी जल्दी इस आदमी से पीछा छूटे...और ऐसी लड़कियों के लिए आदमी भी यही सोचता है....कि...कितनी घमंडी है...मार्केटिंग कैसे करती है...मगर सफीना समुन्दर में तैरता हुआ एक ऐसा फूल थी....जो लहर के साथ ऊपर-नीचे हो रही थी...और देखने वाले को एक तसल्ली मिल रही थी...देखने वाला ये सोच रहा था कि...कितना खूबसूरत फूल है...देखो कितनी बेपरवाही से अकेला समुन्दर की लहरों पर तैर रहा है....

सफीना को देखकर ऐसा लग रहा था कि...सफीना खुद चाहती है कि मैं उससे मिलूं....तो फिर मुझे मना करने का कोई बहाना नहीं मिला...और फिर मेरे लिए तो अच्छा ही था...सफीना फिर मिलने का वादा करके चली गई...जाते हुए उसके चेहरे पे एक मुस्कान थी...कि जिस काम से वो आई थी....वो हो चुका था...और मेरे चेहरे पे एक मुस्कान थी...जो सफीना को देखने के बाद आई थी...मैं भूल गया कि वो लड़की पच्चीस हजार का चेक लेकर गई है...पता नहीं क्या करेगी...?

फिर दोपहर में उसका फोन आया...”सर आपका ‘वेलकम किट’ रेडी है....मैं आ जाऊं देने के लिए...?” मैंने पूछा...”इतनी जल्दी...? आपने तो कहा था...दो दिन लगेंगे...?” फिर उसने कहा...”हां सर...सब डिटेल्स ठीक थीं इसलिए जल्दी हो गया...” उस वक्त एक बज रहा था...नमाज का वक्त हो रहा था...मैंने कहा...”अभी तो मैं नमाज के लिए जा रहा हूँ...आप उसके बाद आइये...” सफीना ने कहा...”ठीक सर...मैं आपको दो बजे फोन करती हूँ...अल्लाह हाफ़िज़....” सफीना ने जो कहना था कह दिया...मुझे बस ये समझ में आया कि वो मुझसे मिलने आ रही है...दो बजे. उसका वो बाद में कहना...”अल्लाह हाफ़िज़...” मेरे दिल को छू गया था...उसने मेरी हिफाज़त के लिए ऐसा कहा था...इसका मतलब उसे मेरी फिक्र थी...और ये अहसास मेरे लिए ऐसा था जैसे मेरे अंदर दो बोतल खून एकाएक बढ़ गया हो...

मैंने नमाज खत्म होने के बाद सफीना को फोन किया...सफीना ने कहा...”सर मैं बांद्रा के लिए निकल गई हूँ...मेरा एक्सिक्यूटिव आएगा और वो आपको किट दे देगा....” मुझे ये कतई मंजूर नहीं था...अभी तो मैं अपने खुदा का शुक्रिया अदा करके आ रहा था कि उसने मुझे इस खूबसूरत सफीना से मिलाया...और अब सफीना कह रही थी कि वो नहीं आ रही है...उसकी जगह कोई और आ रहा है...

तब तक मुझे भी इतना हौसला मिल चुका था कि मैं अपने दिल की बात कह सकता था...सो मैंने भी कह दिया...”जी... ये ठीक नहीं है....आपने कहा था कि आप आएँगी...अब आप किसी और को मत भेजिए...मैंने तो सोचा था आप आएँगी फिर हम दोनों एक साथ लंच करेंगे....”

सफीना का दिल बहुत बड़ा था...उसने मुझे नाराज नहीं किया और अगली सुबह साढ़े नौ बजे अंधेरी स्टेशन पर मिलने का वादा किया...अगली सुबह मैं जल्दी-जल्दी तैयार होकर स्टेशन पहुँच गया...मगर सफीना अभी नहीं आई थी...मैंने फोन किया तो उसने कहा...”मैं दस मिनट में पहुँच रही हूँ...” दस मिनट बीस मिनट में बदल गए...दस बजने को आये थे मगर सफीना अभी नहीं आई थी...मेरे दिमाग में बहुत सारे ख्याल आ-जा रहे थे...मैं सोच रहा था... सफीना के साथ मैक्डोनाल्ड में नाश्ता करूँगा....फिर साथ में ऑटो में बैठकर अंधेरी ईस्ट चलेंगे...दोनों का आफिस उधर ही था...

काफी देर इन्तजार करने के बाद सफीना आई...मैंने सफीना को देखा...वो मेरी ही तरफ आ रही थी...मगर आज मुझे वो रौनक उसके चेहरे पर दिखाई नहीं दी...शायद मेरी नज़र में कोई कमी आ गई थी...शायद मैं सफीना को अकेले मिलना चाहता था और सफीना अपने साथ एक बॉडीगार्ड लेकर आई थी...सफीना के साथ में एक लड़की और थी...मुझे उस लड़की के बारे में कुछ नहीं कहना था...मुझे शिकायत हो रही थी सफीना से....मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा था...इतनी सारी बातों के बाद सफीना मुझसे सिर्फ काम के सिलसिले में मिलने आई थी...उसने मुझे ‘वेलकम किट’ दिया और कहा... “इसमें से एक पेपर मुझे चाहिए...” उसने मुझे लिफाफा खोलने के लिए कहा....मगर मैं तब तक इतना हार चुका था कि एक लिफाफा भी नहीं खोल सकता था...मैंने उसी से कहा...”आप ही खोलिए...” सफीना ने जल्दी-जल्दी लिफाफा खोला और मुझे सारी चीजें दिखाई...”ये है आपका एटीएम कार्ड... ये है चेक बुक...ये तीनों पासवर्ड...एक एटीएम का ...एक...नेटबैंकिंग का...और ये फोन बैंकिंग का...”

मैंने पूछा...”अब आपको किधर जाना है...” सफीना ने अपनी उसी मोहक अदा से कहा...”अब मुझे दादर जाना है...” पहली बार मुझे लगा कि सफीना झूठ बोल रही है....सच जो भी हो लेकिन एक सच ये था कि सफीना मेरे साथ नहीं थी...उसने...कहा...”और कुछ...?” मैं कहना तो चाह रहा था मगर मैं कैसे कहता उसके साथ एक लड़की और थी...मैं कुछ न कह सका...सफीना...”ओके...बॉय...” कह कर चल दी....मैं उसे जाते हुए देख रहा था...मैं सोच रहा था...किसी ने सच ही कहा है....धोखा हमेशा खूबसूरत ही होता है...लेकिन सफीना ने कोई धोखा नहीं दिया था...वो तो बस अपना काम एक ‘अपनेपन’ से कर रही थी....वो तो मैं था जो उसके इस बेबाक ‘अपनेपन’ में अपने आप को ढूँढ़ रहा था....

कैस जौनपुरी

qaisjaunpuri@gmail.com

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चित्र - ज्ञानेन्द्र टहनगुरिया की कलाकृति

10 blogger-facebook:

  1. ये इंसान ही ना जाने कैसे कैसे सपने बुन लेता है।

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  2. Qais...!

    Kaash aap ki tarah har kisi kaa dil aur mann paak-saaf hota...!

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  3. मासूम सी...फूल जैसी...कोमल...अनछुई...कच्ची कली जैसी...
    ये बताना भी जरूरी था हा हा

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  4. कहानी पसन्द आयी। लेखक के बारे में जानकारी मिल सकती है क्या?

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  5. नमस्कार क़ैस,

    आपकी कहानी का ऑडियो अब आवाज़ पर निम्न लिंक पर सुना जा सकता है:
    http://podcast.hindyugm.com/2011/06/safina-by-qais-jaunpuri.html

    रतलामी जी, एक अच्छे कहानीकार से परिचय कराने का शुक्रिया!

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  6. जो दीखता है वो बिकता है............. अच्छी रचना है

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