सोमवार, 9 मई 2011

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - आम-सूत्र

   
इधर काफी समय से एक विज्ञापन पर नज़रें जमी हुई थीं, जिसमें एक युवती आम-सूत्र शब्द का उच्चारण इस अंदाज में करती है कि दर्शकों-पाठकों को काम-सूत्र शब्द का आभास होता था। कवि हैरान परेशान था। इधर आम का मौसम आ गया है, सो कवि ने काम-सूत्र की तर्ज पर आम-सूत्र पर लिख मारा। जैसा कि चचा गालिब फरमा गये हैं केवल गधे ही आम नहीं खाते चूंकि कवि गधा नहीं है सो आम खूब चूसता है। 
कच्ची हरि केरी को देखकर तो कवि के मुंह से लार टपकने लग जाती है। वैसे भी कवि को खट्टा ज्यादा पसंद आना कोई बड़ी बात नहीं है। रेशेदार आम की गुठली चूसते समय तो दाढ़ी की याद आ जाती है। वैसे भी आम तो आम और गुठलियों के दाम भी आजकल आसमान छू रहे है। अम्मा महंगाई की मार कम करने के लिए आम के छिलकों की सब्जी, गुठली के अन्दर के बीज की सब्जी भी बना देती थी ताकी मंहगाई की कुण्डली के राहू-केतू-शनि शान्त हो जाये। 
इधर बाजार में आमों की बहार आई नहीं और स्वर्गीय दादाजी टोकरे भर भर कर आम ले आते। हम भी खाते और मोहल्ले-रिशतेदारी में भी भिजवाते मगर अब वो सब कहां। अब एकाध आम लाते हैं। उसे ठण्डा करते हैं। तराशते हैं, फांके करते हैं और घर के हर सदस्य को आम की एक फांक मयस्सर हो जाती है। राजागिरी  अलफासों या असली हापुस तो अमेरिका वाले खाते हैं बाबूजी कहा मुझे एक मेवा फरोश ने। आम हिन्दुस्तानी बढिया मंहगे आम क्या खा कर खोयगा। मेरा मन भी अमेरिकी बनने का हो गया। 
आम तो आम खास भी आम नहीं खा पा रहा। मगर क्या करुं गर्मियो में पोते-पोतियों, नाति-दोहिते-दोहितियां, बेटी, बहन, भुवा पीयर आती तो आमों के सहारे पूरी गरमियां कट जाती। आम का पणा, केरी की छाछ, केरी का शर्बत और न जाने क्या क्या मगर आजकल की कामकाजी बहुओं को केरियर की पड़ी है, बेटी,बहन, भुवा को कौन याद करता है। आम के नामों की एक अलग ही दास्तान है रंग  रुप के आधार पर आप आम को सफेदा, भूरा, तोतापुरी, बाम्बे यलो, नीलम, सिन्दूरी आदि बुला सकते है। ‘शक्ल-सूरत के आधार पर, करेला, गोल, चिकना, हाथी फल, सीपियां, चैसा आदि कह सकते हैं। जगह के हिसाब से सूरत, रत्नागिरी, राजपुरी, मलीहाबादी, आदि नाम भी प्रचलित है। नामों के आधार पर दशहरी, फजली, जाफरान, अलफासांे, आदि नाम भी बहुत प्रचलित है। लेकिन देशी रेशेदार आम का मजा ही कुछ और है। 
कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर को भी आम बहुत पसंद थे। यदि कलम में दम हो तो आप अमरुदों को भी आम के समकक्ष साबित कर सकते है। एक आम का नाम ककड़िया भी है जिसकी गुठली लैला की पसलियों की तरह पतली होती है। औरगंजेब में ओर कई ऐब होंगे मगर आमों के मामले वो पूरा बादशाह था, उसने आमों के नाम संस्कृत में रखे। और बहुत ही मौजूं रखे। उसने आम को रसना-विलास कहा। एक अन्य नाम सिद्धरस दिया। अकबर ने आमों के बड़े-बड़े बाग लगवाये। 
अभी भी भारत के प्रधानमंत्री पाकिस्तानी राप्टपति को आमों की सौगातें भेजते हैं। वैसे संस्कृत में आम का एक नाम चूत-फल भी है। आम खाईये बन्धु पेड मत गिनिये। कवि और आम-सूत्र से बात शुरु हुई तो उर्दू के मश्हूर शायर अकबर इलाहाबादी का यह कलाम पढ़िये और रुखसत होने की इजाजत दीजिये क्योंकि कविप्रिया ने फ्रिज से ठण्डे दशहरी आम निकाल कर तश्तरी में रख दिये हैं।
    नामा न भेजिये, न तो पैगाम भेजिये।

इस रुत में अगर भेजिये तो आम भेजिये।।

इसका रहे ख्याल कि रख के भी खा सकूं।

पच्चीस गर हो पक्के तो दस खाम भेजिये।।

मालूम ही है आपको बंदे का एड्रेस।

सीधे इलाहाबाद मेरे नाम भेजिये।।

0                0                0

यशवन्त कोठारी, 86, लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर - 2, फोन - 2670596e-mail ID - ykkothari3@gmail.com
m--09414461207

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------