यशपाल कश्यप की प्रेम कविता - इंतजार


जब तुम्हें पहली बार देखा
 तो मेरे दिल में खयाल आया-
कि तुम्हें रब ने सिर्फ मेरे लिए बनाया
हम छुप छुप के
तुम्हें देखा करते थे और
तुम्हारे दीदार होने पर
आहें भरते थे

जब जब तुम्हारी
याद आती थी
हमारी आँखों में नमी छा जाती थी
रात दिन सुबह शाम
हम ऊपर वाले से दुआओं में
तुम्हें मांगा करते थे
पर
तुमसे ये कहते डरते थे

तुम्हारी हर अदा से
हमें प्यार था
हमारा दिल बस
तुम्हें पाने के लिए बेकरार था

तुम्हें याद करते ही
हम भीड़ में
तनहा हो जाते थे
और जिस दिन
तुम न मिलती
हम खुद में सिमटकर
रो लिया करते थे

हम तुमसे
इतना प्यार करते थे
कि तुम्हें अपने खून से
खत लिखने का दर्द
तुम्हारी यादों
और तुम्हें खोने के दर्द से
कम होता था

मेरी हर सुबह
तुम्हें याद करके होती थी
और हर रात
तुम्हें इन पलकों में समेटकर होती थी
मैं और मेरी दुनिया
बस तुमसे सिमट गई थी
मेरी दुनिया उस दिन
खत्म हो गई
जिस दिन तुमने
 मुझे तनहा छोड़ दिया

तुमने हमें
और हमने ये दुनिया छोड़ दी
हमने तो मरने के वक्त भी
तुम्हारे इंतजार में
अपनी आँखें खुली रखी थी
पर ये जालिम दुनिया
मरने वाले आशिक की
आँख बंद कर दिया करते हैं

पर आज भी
इन बंद आँखों से
तुम्हारा इंतजार किया करते हैं
उस दिन
हमारी आखिरी दुआ भी
कुबूल हो जाएगी जिस दिन
तुम हमारे कब्र में फूल रखने आओगी

इसी बहाने
तुम भी इस पागल को
आखिरी बार याद कर लेना
और अपने जीवन का एक पल
मेरे नाम कर देना
शायद हमारी आँखों में ठहरा
आखिरी आँसू भी बह जाएगा
और हमें अपने कब्र में
सुकून मिल जाएगा...

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1 टिप्पणी "यशपाल कश्यप की प्रेम कविता - इंतजार"

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