रविवार, 29 मई 2011

इक़बाल हुसैन ‘इक़बाल’ की ग़ज़लें

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ऐसे गुजारियेगा कड़वाहटों के दिन,
सुख से कटें तुम्हारी घबराहटों के दिन।

बेचैन से कटें अब तस्कीन के लम्हे,
कितने हसीन थे वो झुंझलाहटों के दिन।

गुज़रे क़रीब से वो जब अजनबी बनकर,
तब याद बहुत आए टकराहटों के दिन।

मायूस है कली तो फरियाद गो गुलशन,
भूले नहीं भुलाते वो आहटों के दिन।

हर सू ख़िज़ा मिलेगी तब काम आएंगे,
महफूज़ आप रक्खें मुस्कुराहटों के दिन।

माना गुजार लोगे तन्हाइयों में तुम,
कैसे भुलाइयेगा गर्माहटों के दिन।


--

कभी राज़ ये भी समझ कर तो देखो,
किनारों में उलझा समन्दर तो देखो।

दिखा तो रहे हो हमें आसमाँ तुम,
ज़रा तुम हमारे कटे पर तो देखो।

तुम्हारी बनाई हदों को न मानें,
उड़ा कर ये पाले कबूतर तो देखो।

निज़ामे ज़माना सुधर कर रहेगा,
हथेली पे रख कर ज़रा सर तो देखो।

हमें ही वो चाहे हमें ही सताए,
मुहब्बत से मारे सितमगर तो देखो।

जहाँ चीज़ क्या है झुकेंगे फरिश्ते,
लुटा घर किसी का बसा कर तो देखो।

--
(राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती, अक्तूबर 2007 से साभार)

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