सोमवार, 30 मई 2011

अख़्तर होशियारपुरी की ग़ज़लें

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कानों में सदाऐं

 

कानों में सदाऐं गूंजती हैं

हाथों की लकीरें_ बोलती हैं

 

चेहरे संजीदा हो गए हैं

अब तो आंखें भी सोचती हैं

 

राहों के अंधेरे छट गये हैं

और राहरौओं को पूछती हैं

 

लम्हों की जुदाइयों में सदियाँ

अपने महवर पे घूमती हैं

 

उड़ती हुई तितलियाँ चमन में

मुड़मुड़ के गुलों को देखती हैं

 

जाती हुई दिल गिरिफ़्ता घड़ियाँ

अपने ज्रख्मों को चाटती हैं

 

और आबे रवाँ की तुंद मौजें

क्या जाने किसे पुकारती हैं

 

आंखें तेरी मुंतजिर हैं शायद

सोते में भी शब को जागती हैं

 

शाखें पेड़ों से कट के ‘अख़्तर’

पेड़ों ही का लम्स चाहतीं है

 

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अगरचे लम्हों के आगे

 

अगरचे लम्हों के आगे दम तोड़ती सदी है

मगर ये लम्हा भी दीदनी है कि रफ़्तनी है

 

मैं पूछता फिर रहा हूँ चीजों का भाव क्या है

कि आज फिर मेरी जात नीलाम हो रही है

 

हवा से मौसम के पत्ते टूटे कि ख्वाब टूटे

हवा से ख्वाबों में फिर भी रंगो की रौशनी है

 

जमाना बारिश में छतरियाँ तानता है लेकिन

ये इक हवेली जो धूप में भी टपक रही है

 

समुदरों में हवा की गिरहों को कौन खोले

कि नाव कागज की बहते बहते ठहर गयी है

 

मैं जिससे मिलकर हवा के पैकर में ढल गया हूँ

वो जब पुकारे तो यूं लगे कोई अजनबी है

 

घरों में चिड़ियों के घोंसले हैं और उनके अंदर

मैं सुन रहा हूँ कि अपनी आवाज गूंजती है

 

मुसाफतों में मुसाफतों का वुजूद बिखरा

सफर की राहों में धूल राहों की अट गयी है

 

हवा के इन बेतनाब खेमों में रहने वालों

तुम्हारी बस्ती समुदरों से घिरी हुई है

 

जहाँ के मंजर बदल चुके हैं बदल रहे है

मगर दरख्तों के बीच ‘अख्तर’ वही गली है

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2 blogger-facebook:

  1. दोनों ग़ज़लें अच्छी....

    उत्तर देंहटाएं
  2. उम्दा ग़ज़लियात, अगर मैं तुलना करूं तो दूसरी ग़ज़ल मुझे ज़ियादा अच्छी लगी।

    उत्तर देंहटाएं

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