बुधवार, 18 मई 2011

मनोज अग्रवाल की कविता और गजल

  garmi ki shaam  

दोपहर में

तपती धूप-

आग-अंगार।

 

और,

ढलती शाम

राग-बहार।

 

हवा में ठंडक

चेहरों पे रौनक,

बच्चे-औरतें,

फरमाईशें,

आइसक्रीम दुकान,

चाट के ठेले,

बाग-बगीचे,

दोस्त-यार,

घुमना-टहलना,

चौक की पान दुकान पर

हंसी-ठहाके,

यही तो है

गर्मी की शाम

का मजा।
   
   

गजल

सावन अब बांट रहा ग्रीष्म की तपन,

बदल रहे मौसम के सभी समीकरण।

 

गरमी में रिमझिम और बारिश में लू,

मौसम के क्रोध का कैसे करें सहन।

 

झांक रहा खिड़की से भीषण दुष्काल,

बारिश की बेरूखी से जिंदगी हो रही दफन।

 

प्रकृति से छेड़छाड़ का है ये नतीजा,

लगाई है आग तो सहो भी अब जलन।

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-मनोज अग्रवाल

मुंगेली,जिला-बिलासपुर

छट्टट्टीसगढ़

1 blogger-facebook:

  1. प्रक्रिति से छेड़ छाड़ का है ये नतीज़ा,
    लगाई है आग तो सहो भी अब जलन।
    बेहतरीन मनोज भाई, मुबारकबाद।

    उत्तर देंहटाएं

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