मंगलवार, 10 मई 2011

प्रमोद भार्गव का आलेख - अयोध्या विवाद पर यथास्थिति




    अयोध्या विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय का यथास्थिति बनाए रखने का फैसला आने की ही उम्मीद थी। सो आया भी। क्योंकि विवादित भूमि 2.77 एकड़ के एक हिस्से पर इस्लाम के दावे को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा मंजूर किए जाने से जो मतांतर सामने आया था, वह असंतोष व शीर्ष न्यायालय में अपील का प्रमुख आधार था। इसी बिना पर स्थगन देते हुए न्यायमूर्ति आफताब आलम और आरएम लोढ़ा की संयुक्त पीठ ने कहा भी कि किसी भी पक्ष ने जब विवादित भूमि बंटवारे की मांग नहीं की थी, फिर यह अजीब व चकित कर देने वाला हाईकोर्ट ने आदेश क्यों दिया ? जबकि फैसला भूमि के मालिकाना हक पर केंद्रित रहना था। इस वजह से इस फैसले को एक नया आयाम मिला और यह विचित्रता की श्रेणी में आ गया। हालांकि न्यायाधीश धर्मवीर शर्मा ने जरूर संपूर्ण विवादित भूमि हिन्दुओं को सौंपने का फैसला दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित भूमि के अह्म पहलू को रेखांकित कर यह जाहिर कर दिया है कि अब जो फैसला आएगा वह भूमि के मालिकाना हक को तय करते हुए, एक सर्वमान्य फैसला होगा और भूमि का बंटवारा संप्रदायों के अनुसार नहीं होगा। शीर्ष न्यायालय ने विवादित व अधीग्रहीत भूमि पर फिलहाल किसी भी प्रकार के निर्माण पर रोक लगाकर भी एक अच्छी पहल की है। बावजूद इसके रामलला की पूजा-अर्चना पूर्ववत चलती रहेगी।

    विवादित परिसर ढांचे से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि किसी मंदिर अथवा धार्मिक स्थल को तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी अथवा नहीं ? इसे हाईकोर्ट के फैसले का संयोग कहिए या विलक्षणता कि  तीनों न्यायमूर्तियों ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट व जुटाये साक्ष्यों के आधार पर निर्विवाद रूप से यह मान है कि राम के बाल रूप में जिस स्थल पर राम की मूर्ति स्थापित है, वही स्थल रामजन्म भूमि है। विवादित ढांचे के विंध्वस के बाद बाबरी संघर्ष समिति की भी यही प्रमुख मांग थी कि पहले यह तय किया जाए कि यही स्थल रामजन्म भूमि है। यह भी सुनिश्चित हो कि बाबरी मस्जिद के वजूद में आने से पहले यहां कोई मंदिर था और यह भी तय किया जाए मस्जिद निर्माण के लिए मंदिर तोड़ा गया था ?

    कुछ इसी धारणा से मेल खाता हुआ सवाल तब की पीवी नरसिंहराव सरकार ने राष्ट्रपति के माध्यम से उच्चतम न्यायालय से किया था कि वह तय करे कि ध्वस्त बाबरी मस्जिद के नीचे कोई मंदिर था अथवा नहीं ? इस सवाल को उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने न केवल असंवैधानिक माना बल्कि धर्मनिपेक्षता के भी विरूद्ध माना था। दरअसल तब केंद्र सरकार की मंशा थी कि सर्वोच्च न्यायालय इतिहास और पुरातत्वीय साक्ष्यों के आधार पर स्थापित करके निर्णय दे कि वहां विवादित ढांचे के विंध्वस से पूर्व कोई मंदिर था अथवा नहीं। न्यायालय ने इस जवाबदेही से खुद को पृथक कर लिया था। वैसे भी किसी भी स्थल के पुरातत्वीय सर्वेक्षण का काम न्यायालय का नहीं है। इस मकसद की पूर्ति के लिए देश में स्वतंत्र रूप से ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग’ का देशव्यापी संस्थागत ढांचा अस्तित्व में है और इसमें दक्ष पुरातत्वविदों का पूरा समूह कार्यरत है।

    बाद में इस सर्वेक्षण की जिम्मेबारी एएसआई को सौंपी गई। इसने विवादित रामजन्म भूमि, बाबरी मिस्जद परिसर के नीचे उत्खनन का कार्य कराया और 5 अगस्त 2003 को खुदाई की 574 पन्ने की रिपोर्ट न्यायालय को सौंप दी। इस खुदाई में जो पुरातत्वीय साक्ष्य मिले उनसे तय हुआ कि तोड़े गए ढांचे के नीचे गयारहवीं सदी के हिन्दुओं के धार्मिक स्थल से जुड़े साक्ष्य बड़ी संख्या में मौजूद हैं। अनेक शिलालेख और भगवान शंकर की मूर्ति मिलने के सबूत भी न्यायालय में पेश किए गए। परिसर का राडार सर्वेक्षण भी कराया गया। इसी से तय हुआ कि ढांचे के नीचे एक और ढांचा है। इन्हीं साक्ष्यों के बूते हाईकोर्ट के तीनों न्यायमूर्तियों ने बहुमत से माना कि विवादित स्थल का केंद्रीय स्थल रामजन्म भूमि है।

    हालांकि निर्मोही अखाडे और गोपाल सिंह विशारद द्वारा मंदिर के पक्ष में जो सबूत और शिलालेख पेश किए गए थे, उनसे भी यह स्थापित हो रहा था कि विंध्वस ढांचे से पहले उस स्थान पर राममंदिर था। जिसे आक्रमणकारी बाबर ने हिन्दुओं को अपमानित करने की दृष्टि से शिया मुसलमान मीर बांकी को मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाने का हुक्म दिया था। मस्जिद के निर्माण में चूंकि शिया मुसलमान मीर बांकी के हाथ लगे थे, इस कारण इस्लामिक कानून के मुताबिक यह शिया मुसलमान की धरोहर था। इसकी व्यवस्था संचालन के लिए शिया ‘मुतवल्ली’ की भी तैनाती बाबर के ही समय से चली आ रही थी। उत्तराधिकारी के रूप में जिस मुतवल्ली की तैनाती थी, उस व्यक्ति ने हिन्दू संगठनों से मिलकर बाबरी ढांचे को विवादित परिसर से बाहर ले जाकर स्थापित करने में सहमति भी जता दी थी। मालिकाना हक भी इसी मुतवल्ली का था। लेकिन सुन्नी वक्फ बोर्ड ने ऐसा नहीं होने दिया और मामला कचहरी की जद में बना रहा।

    इस आधार के बूते तय था कि हिंदू संगठन हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौति देंगे। यह भी तय था कि इस बूते के मुताबिक मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाना गैर-इस्लामिक है तो फिर सुन्नी वक्फ बोर्ड को परिसर का एक तिहाई हिस्सा देने की बात क्यों कही गई ? दूसरे जब न्यायालय ने बोर्ड के मालिकाना हक को ही खारिज कर दिया तो फिर परिसर का एक तिहाई हिस्सा बोर्ड को किस बिना पर दिया जाए ? दूसरे सुन्नी वक्फ बोर्ड का इसलिए सुप्रीम कोर्ट में जाना तय था कि जब उसे परिसर का एक तिहाई हिस्सा हाईकोर्ट ने देना उचित माना है, तो फिर उसका मालिकाना हक क्यों सुनिश्चित नहीं किया गया ? हालांकि बोर्ड हाईकोर्ट के पूरे फैसले से खिन्न था और उसने फैसला आते ही शीर्ष न्यायालय जाने का ऐलाने कर दिया था। वैसे, अंशिक विरोधामास तो हर फैसले में रहते हैं और सभी पक्षकारों की मंशा के अनुरूप अदालती फैसले संभव भी नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला जो भी आए उससे भी सभी पक्षों का संतुष्ट होना नामुमकिन ही है। चूंकि हाईकोर्ट की खण्डपीठ के तीनों न्यायामूर्तियों ने विवाद के मूल जिस गर्भगृह को राम का जन्म स्थान होना सुनिश्चित किया है, इस निर्विवाद निर्णय को एकाएक सुप्रीम कोर्ट भी नहीं बदल सकती।

    हाईकोर्ट के फैसले में राम की दिव्यता और उनके प्रति आस्था का जिक्र भले ही हो लेकिन तीनों विद्वान न्यायाधीशों ने आखिरकार जनभावनाओं और आस्था को दरकिनार करते हुए फैसले का आधार पुरातत्वीय सर्वेक्षण की रिपोर्ट और साक्ष्यों को ही माना है। बहरहाल अपील स्वीकारते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जिन बिन्दुओं को रेखांकित किया है, उनका अंतिम निराकरण जल्द होना चाहिए, जिससे विवादित भूमि का सांप्रदायिक आधार पर जो बंटवारा हाईकोर्ट के फैसले में किया गया है, उसका निराकरण हो। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद निकलने वाले सर्वमान्य हल से मुद्दे को लेकर सांप्रदायिक विद्वेष की जो आग बीच-बीच में भड़कती रहती है, उस आग में हमेशा के लिए पानी डल जाएगा।

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फोन नं. 07492-232007, 233882

ई-पता
pramodsvp997@rediffmail.com


प्रमोद भार्गव

शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी (म.प्र.) पिन-473-551
लेखक वरिष्ठ कथाकार एवं पत्रकार हैं।

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