गुरुवार, 12 मई 2011

कृष्ण गोपाल सिन्हा की कहानी - कोखदान

"संतान के लिए इच्छुक दम्पति किराए पर कोख के लिए संपर्क करें मोब. ०९४१२१९११०३." नरेश की नज़र इस विज्ञापन पर पडी तो उसकी बुझ रही उम्मीदों में नयी जान आने लगी. उसने यह बात अपनी पत्नी सुजाता को बतायी और दोनों ने यह फैसला किया कि इधर उधर भटकने और पूछताछ करने के बजाय वे अब इसकी मदद लेंगे और अपनी वीरान ज़िंदगी को हराभरा होते देखेंगे. नरेश ने विज्ञापन में दिए गए नम्बर पर संपर्क किया तो एक महिला ने व्यक्तिगत रूप से मिलने की ज़रूरत बतायी. निश्चित समय और स्थान पर नरेश पहुंचा तो यह देखकर अवाक् रह गया कि जिस महिला से वह मिलने गया था वह उसकी पूर्व परिचित सुगंधा थी. अचम्भा दोनों को ही हुआ,दोनों को कुछ अटपटा भी लगा पर दोनों ने अपने को सम्भाला.

सुगंधा बिल्कुल सुरेखा पर गयी थी. उसका रंग रूप और नैन नक्श सुरेखा से पूरी तरह मिलता जुलता था. सुगंधा के पिता सूर्यप्रताप जी अपनी पत्नी यशोदा को जी जान से चाहते और प्यार करते थे. सन्तान सुख से वंचित सुगंधा के माता पिता को डॉक्टरों की राय के अनुसार संतान प्राप्ति के लिए किसी ऐसी महिला की मदद दरकार थी जो अपनी कोख में उनकी संतान को रखने और जन्म देने को तैयार होती.

सुरेखा नाम की एक मध्यमवर्गीय और भद्र महिला ने यह ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार हुई जो अपने परिवार की ज्यादतियों से आजिज आकर अपना शहर छोड़कर यहाँ आ गयी थी और गुमनामी की ज़िंदगी जी रही थी. इसी बीच उसका परिचय एक भद्र पुरुष नर्वदा जी से हुई जिन्होंने अपना सर्वस्व परोपकार और परमार्थ के लिए समर्पित करने का व्रत लिया था और इसके लिए एक संस्था के माध्यम से लोगों की मदद किया करते थे. उन्होंने ही संस्था के कार्यों में हाथ बँटाने के लिए सुरेखा को अपने संस्था से जोड़ा था. सुरेखा को इससे अपना जीवन निर्वाह करने और समय के सदुपयोग में भी मदद मिलती थी. काफी समझाने बुझाने के बाद सुरेखा यह ज़िम्मेदारी लेने को अपने को तैयार कर पायी थी. नर्वदा जी ने ही सूर्यप्रताप जी को सुरेखा से मिलवाया था और दोनों को एक निर्णय पर पहुँचने में मदद भी की थी. सुरेखा की तरफ से इस ज़िम्मेदारी के बदले न तो कोई शर्त रखी गयी थी और न ही इसके लिए सूर्यप्रताप जी की तरफ से मदद के लिए कोई आश्वासन ही दिया गया था. सब कुछ नर्वदा जी को तय करना या देखना था.

ग्यारह साल बाद आज अचानक नरेश की मुलाक़ात सुगंधा से हुई तो दोनों चौंक गए. दोनों के सामने वह सारी बातें किसी फ्लैशबैक की तरह आने लगी थी जो उन दोनों के अलग होने का कारण बनी थी और जिसने उन्हें अलग कर दिया था. दरअसल, उन्हें तब अपने प्यार का गला घोटना पड़ा था. दोनों साथ पढ़े थे. दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह समझते थे, पसंद करते थे और साथ साथ जीना और मरना चाहते थे. नरेश के परिवार वाले पहले तो दोनों के रिश्ते के लिए रजामंद थे पर इस बीच जब उन्हें पता चला कि सुगंधा का जन्म जिस कोख से हुआ था वह उसके माता पिता को किराए पर लेना पड़ा था.

नरेश और सुगंधा के बीच थोड़ी देर तक खामोशी बनी रही. पहल नरेश ने की. “ईश्वर ने शायद तुमसे मुझे इस लिए मिलाया है कि मैं तुमसे अपनी बुजदिली के लिए माफी मांग सकूं." सुगंधा ने नरेश की ओर देखा. कुछ बताना और कुछ पूछना चाहती थी. वह एक कशमकश में थी कि वह नरेश से अलग होने के बाद जिस दौर से उसे गुजरना पड़ा वह बताये या चुप रहे. इस बीच नरेश अपना मन उसके सामने खोलते हुए कह रहा था," सुगंधा, इसे उचित समझो या अनुचित, जायज समझो या नाजायज, नैतिक समझो या अनैतिक पर मै खुद से तुमको कभी अलग नहीं कर सका. यह बात तुम्हे सुनने में भले ही अजीब लगे पर मै अपना एक गुनाह आज कुबूल करना चाहता हूँ कि मुझे कुछ भी अच्छा लगा या अच्छा महसूस हुआ तो मेरे अहसासों में तुम बनी रही. कोई बिना साथ रहे भी इतना पास और इतना नजदीक महसूस हो सकता है यह मैं ही जानता हूँ. मुझे तुमसे यह बात कहते हुए किसी भी तरह की हिचक नहीं है कि सुजाता और मेरे बीच सब कुछ सामान्य होते हुए भी सच यह था कि मेरे अहसासों को तुमसे नयी ताज़गी और नयेपन का अहसास होता था और यह बात मैं कभी भी सुजाता के सामने न रख सका और न ही ज़ाहिर ही होने दी. तुम शायद इसे मेरी एक बहुत बड़ी गुनाह मानो जो मैंने सुजाता के साथ की ."

नरेश की बातों को सुनकर उसे अजीब लगा. उसने कभी यह सब और ऐसा कुछ सोचा ही नहीं था. उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह आगे क्या कहे. नरेश की बातों ने उसे अन्दर काफी गहराई से छुआ था. सपने में भी कभी ख़याल तक भी नहीं आया कि इस तरह उसका प्यार उसके सामने होगा और वह सब उसे महसूस कराएगा जिसका उसे न तो कोई अनुमान था और न ही कोई तजुर्बा ही था. वह अब अपने को रोक नहीं पायी और ग्यारह साल के लम्बे अंतराल से पैदा हुई दूरी पलभर में मिट गयी. सुगंधा ने नरेश का हाथ अपने हाथों में लेकर कुछ पल चुप रही और नज़रे नीची किये बैठी रही. दोनों ही यह भूल गए कि उनके आज की मुलाक़ात का मकसद क्या है. सुगंधा की नज़रें उठी तो वे नम थीं. बिना कुछ बोले वह नरेश का हाथ पकड़े हुए खड़ी हुयी और बाहर सड़क पर आ गयी. नरेश चुप रहा और सुगंधा के साथ उसकी कार में बैठ गया. सुगंधा अपने अपार्टमेन्ट पहुंची और अब दोनों उसके फ्लैट में थे. दोनों ने एक साथ चाय पी और सुगंधा के प्रस्ताव पर नरेश ने दूसरे दिन आने की हामी भरी. सुगंधा ने अपने बारे में आज न तो कुछ बताया और न ही नरेश ने ही कुछ जानने का कोई उतावलापन दिखाया. नरेश के जाने के बाद सुगंधा बस यही सोचती रही की कैसे वह अपना मन उसकी ही तरह नरेश के सामने खोलकर रख दे और फिर सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दे जिसने उसे अलग किया था और अब मिला भी दिया.

नरेश ने बड़े ही बेसब्री से दूसरे दिन का इंतज़ार किया और सीधे सुगंधा के यहाँ पहुंचा. वह उसका इंतज़ार तो कर ही रही थी वह बहुत खुश भी थी. सुगंधा ने सोच रखा था कि आज केवल वही बोलेगी और नरेश को बताने लगी कि कैसे उसके माँ बाप ने उसकी शादी एक बहुत ही धनाढ्य परिवार में कर दिया और उसके पति से उसका सम्बन्ध केवल पत्नी कहे और माने जाने तक ही सीमित रहा. सुगंधा को यह बताने में अछा लगा कि नरेश से अलग होने के बाद ही उसने यह निश्चय कर लिया था कि वह कभी भी किसी पुरुष से कोई सम्बन्ध नहीं बनायेगी. उसे अपने इस निश्चय को निभाने में उसके पति ने भी मदद देने का भरोसा दिलाया जो बिजनेस के सिलसिले में अक्सर शहर से बाहर ही रहा करते थे. ऐसी परिस्थिति में सुगंधा को घुटन ज़रूर होती थी पर वह अपने निश्चय से बंधने के अलावा नरेश को भूल भी नहीं पा रही थी. सुगंधा की शादी के दो साल बाद ही उसके माता पिता एक प्लेन क्रैश में मारे गए थे इसलिए अब उसके सुख दुःख को सुनने और बांटने वाला भी कोई नहीं था. ऐसी हालत में अपने को व्यस्त रखने के लिए उसने एक दूसरे शहर के एक कॉलिज में नौकरी ज्वाइन कर ली थी जो उसे एक बहुत ही बड़ी रक़म देने के एवज में मिली थी. पति और परिवार से उसने सम्बन्ध नहीं तोड़ा था इसलिए पति का उसके यहाँ कभी कभार आना जाना चलता रहा पर दोनों ही दाम्पत्य सुख से अपने को अलग रखे हुए थे.

सुगंधा की बातों को सुनकर नरेश के मन में उसके लिए सम्मान और जगह के साथ साथ बेपनाह प्यार बढ़ता जा रहा था. जो कुछ उसने अपने बारे में सुगंधा को बताया था वह उसे सुगंधा के प्यार और त्याग की तुलना में बहुत कम, छोटा और थोथा लग रहा था. सुगंधा का उसके प्रति सोच और व्यवहार को लेकर भी वह यह तय नहीं कर पा रहा था कि अब वह आगे अपने रिश्तों को क्या रूप दे. सुजाता के साथ भी किसी तरह का अन्याय वह नहीं होने देना चाहता था क्योकि संतान के सुख से वंचित रहने के बावजूद वह हर मौके और हर मामले में नरेश का पूरा साथ देती थी और एक अच्छी पत्नी होने के गुणों से संपन्न होने के साथ साथ बहुत ही भद्र और सुन्दर थी.

नरेश और सुगंधा न तो वर्तमान को नकारना और उलटना चाहते थे और न ही वे ग्यारह साल पहले के अतीत को लौटा ही सकते थे. सुगंधा के मन में सुजाता के लिए पूरा सम्मान और सन्तान सुख से उसके वंचित होने के दर्द का अहसास भी था. वह अब सम्बन्धों को लेकर सारे निर्णय खुद ही करना चाहती थी. इस बारे में वह सुजाता की मदद ले नहीं सकती थी और नरेश के ऊपर कोई भार डालना नहीं चाहती थी. अपने प्रति नरेश की भावनाओं से वह भली भांति परिचित हो चुकी थी. किराए की कोख से पैदा होने के कारण उसे कितना दुःख सहना पड़ा था इसे अब नरेश और सुगंधा दोनों ही समझते थे. अभी तक दाम्पत्य सुख से वंचित होते हुए भी वह उस अनुभव से गुजरना चाहती थी जो उसे नौ माह तक अपने गर्भ में रखने के लिए किराए पर अपनी कोख देने वाली सुरेखा को हुआ था. इसी लिए उसने भी अपनी कोख को किराए पर देने का निर्णय करते हुए विज्ञापन दिया जो उन दोनों के मिलने का माध्यम बना.

सुगंधा ने नरेश को बताया कि वह सुजाता से मिलना चाहती है और पर किसी भी कीमत पर वह नहीं चाहेगी कि उसकी वजह से उसे किसी तरह कि भावनात्मक या मानसिक ठेस पहुचे और इसीलिए वह अपने और नरेश के बीच परिचय और पूर्व संबंधों को लेकर कभी भी कुछ भी उससे शेयर न तो खुद करना चाहेगी और न तो यही चाहेगी कि नरेश की तरफ से ऐसी कोई बात होनी चाहिए. नरेश सुगंधा की इन बातों से पूरी तरह सहमत था. बात-बात में सुगंधा बहुत भावुक हो गयी और कहने लगी कि सुजाता मेरे लिए अब इसलिए भी ख़ास है क्योंकि नरेश के अहसासों में मेरे बने रहने के लिए वह माध्यम थी हालांकि इस बात से वह अनजान रही जो अच्छा ही रहा वरना सब कुछ नॉर्मल नहीं रह पाता.

नरेश सुजाता के अहसासों में पूरी तरह उसके साथ था पर सुगंधा की सोच और अहसासों का भी उसे पूरा अनुमान था. वह कुछ भी ऐसा सोचना या करना नहीं चाहता था जिससे सुजाता की भावनाओं को कोई ठेस पहुचे. दरअसल वह बिना सुजाता को कोई कष्ट या तकलीफ पहुंचाए सुगंधा को उसके एकाकीपन से बाहर निकालना चाहता था. नरेश और सुगंधा में से कोई भी वर्तमान को पूरी तरह से नकारना और बदलना नहीं चाहते थे पर कोई ऐसा समाधान और हल चाहते थे जिससे तीनों ही सम्बन्धों में बिना किसी तनाव या अड़चन के साथ अपने जीवन को खूबसूरत बना सके. नरेश के सामने यह बात सुगंधा ने रखी पर नरेश कुछ समझ नहीं पा रहा था. एक अच्छे दोस्त होने के नाते सुगंधा ने नरेश को समझाया कि हम इत्मीनान से हर बात का हल ढूंढ लेंगे और इसके लिए दोनों को थोड़ा समय चाहिए. इन बातों से नरेश और सुगंधा दोनों खुश थे. सुगंधा ने नरेश को सलाह दी कि ज़ल्दी में हमें कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए.

अब नरेश और सुगंधा अक्सर मिलने लगे. नरेश को यह सब इसलिए और अच्छा लगने लगा क्योकि सुगंधा के चहरे पर एक नयी चमक रहने लगी. नरेश ने यह भी महसूस किया कि उसकी आवाज़ में मायूसी और बेज़ारी की जगह अब खनक और मिठास थी. वह अब ऐसा कुछ भी कहना और करना नहीं चाहता था जिससे उसके चहरे पर आयी चमक और आवाज़ की खनक में ज़रा सी भी कमी हो. खैर, दोनों अपनी ज़िंदगी में आये इस परिवर्तन से काफी खुश और संतुष्ट थे. दो चार दिन इस तरह कैसे बीत गए पता ही नहीं चला. पर सुगंधा यह नहीं भूली कि उनके मिलने की वजह क्या थी इसीलिये उसने इस बात को करना ज़रूरी समझते हुए नरेश से ही पूछा कि आगे क्या करना होगा. नरेश को लगा कि वह तो इस बारे में कुछ सोचने और करने की बात भूल गया था. नरेश ने अब कुछ भी सोचने, निर्णय लेने और करने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह सुगंधा के हवाले कर दिया.

इस बीच सुगंधा ने जो सोचा और तय किया था उसे नरेश के सामने रखने का सही समय समझते हुए बोली," मैंने सारी बातों पर बहुत गहराई से सोचकर एक “डीड” तैयार की है जिस पर हम दोनों को सहमत होना होगा और उसी के अनुसार हमारे रिश्ते तय होंगे." डीड की बात सुनकर नरेश थोड़ा घबराया पर सुगंधा ने तुरंत उसे संभाल लिया और कहने लगी, " मुझे तुम्हारे अहसासों में आगे भी रहने में कोई ऐतराज़ नहीं है और सुजाता की जिस कमी को तुम दोनों भरना चाहते उसमे भी मै अपना हिस्सा देने के लिए तैयार हूँ लेकिन अपने हिस्से के एवज में मुझे कुछ भी नहीं चाहिए." यह कहते हुए सुगंधा के चहरे पर एक अजीब और नयी चमक आ गयी थी. नरेश कुछ समझ नहीं पा रहा था. अब सुगंधा उसके काफी नज़दीक आ गयी थी. नरेश के हाथों को अपने हाथों में लिया. उसे पहली बार नरेश के पास आकर ऐसा लग रहा था कि वह सदियों से उसके पास रहती आयी है. उसके अहसासों में नयापन था, ताज़गी थी, अपनापन था. दोनों खामोश थे पर उनकी आँखों में सपने थे. नरेश कुछ कहता या पूछता उससे पहले ही सुगंधा अपने को रोक नहीं पाई और कह रही थी," मै तुम्हें सन्तान के लिए सिर्फ अपनी कोख देने से होने वाली खुशी की जगह तुम्हें तुम्हारी ही सन्तान देना चाहती हूँ. तुमने मुझे केवल अपने अहसासों में रखा और इसके लिए तुम्हें सुजाता की मदद लेनी पडी. जो कुछ तुमने किया उसे गुनाह कहते और कुबूल करते हो तो क्या मेरे लिए भी एक ऐसा गुनाह नहीं करोगे जिसमे मैं भी तुम्हारा साथ दे सकूँ. नरेश, बस एक गुनाह और एक झूठ से सब कुछ बदल जाएगा. " कब तक दोनों अपनी बाहों में लिए एक दूसरे को निहारते रहे, समय को भी इसका अहसास नहीं हो सका.

समय और अहसासों ने जब इन्हें कुछ मोहलत दी तो सुगंधा ने बहुत ही मुलायम लहजे में नरेश से कहा, " नरेश, मै कभी भी कुछ भी ऐसा नहीं होने दूंगी जिसका असर तुम्हारे और सुजाता के संबंधों पर पड़े. मै तो पहले भी तुम्हारे अहसासों में रहती ही आयी हूँ और आगे भी रहूंगी, यही मेरे लिए बहुत है. पर बस एक बार मैं उन अहसासों से गुजरना चाहती हूँ जिसे मुझे अपने पास महसूस करते हुए तुम सुजाता को देते हों. इसके बाद बस एक झूठ में हम दोनों पूरी ज़िंदगी एक साथ होंगे और वह झूठ होगा कि मैंने अपनी कोख को तुम्हारे संतान को किराए पर देने के बजाय भेंट में दिया है. लेकिन अगर तुम समझते हो कि इसके लिए तुम्हें कोई कीमत....इतना सुनते ही नरेश ने उसके मुह पर अपना हाथ रखते हुए उसे अपने सीने से लगा लिया और बोला, " बस भी करो सुगंधा" और दोनों एक दूसरे के आगोश में खो गए.

सुगंधा ने जो “डीड” बनाया था उसपर दोनों ने अपनी रजामंदी दे दी थी. नरेश सुजाता को सुगंधा से मिलवाने ले गया. तीनों बहुत खुश थे. नरेश और सुगंधा ने मिलकर सब कुछ प्लान किया. सुजाता और नरेश ने मेडिकल से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी की. सुगंधा और नरेश ने मिलकर रास्ता निकाला और बस एक झूठ को दोनों ने मिलकर अंजाम दिया.

नरेश और सुगंधा के बीच दोस्ती और सुगंधा और सुजाता के बीच सहेली का रिश्ता बना जो पूरी ज़िंदगी चलता रहा. समय पूरा होने पर सुगंधा ने एक बेटी को जन्म दिया जो बहुत ही प्यारी और खुबसूरत थी. तीनों में इस बात की होड़ लगी रहती की वह किस पर गयी है. सुगंधा कहती कि वह नरेश को पडी है तो सुजाता कहती कि वह सुगंधा पर गयी है और नरेश को लगता था कि वह सुजाता और सुगंधा दोनों पर गयी है. सुजाता और सुगंधा के बीच मेलजोल और एक दूसरे के प्रति सम्मान देखकर नरेश बहुत खुश था. सुगंधा संतान पाकर सुजाता और नरेश की खुशी देखकर खुश थी. सुगंधा अब इस परिवार का एक अंग थी और अलग रहते हुए भी यह महसूस करती थी कि एक नए मेहमान के आने से दोनों घरों में बेपनाह खुशियाँ बिखरी थी.

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लेखक परिचय

भारतीय प्रसारण सेवा के प्रोग्राम कैडर के अवकाश प्राप्त वरिष्ठ अधिकारी तथा आकाशवाणी के पूर्व निदेशक कृष्ण गोपाल सिन्हा का जन्म नवम्बर 1945 में जौनपुर (उ.प्र.) में हुआ. व्यंग्य लेखन में विशेष रूचि के अलावा कहानियों और कविताओं की भी रचना की. कादम्बिनी, अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, पांचालवानी,तरंग तथा हिंदी साहित्य निकेतन द्वारा प्रकाशित 1996,1998 व1999 की श्रेष्ठ हास्य व्यंग्य संग्रह में इनके व्यंग्य प्रकाशित हुए. इनका व्यंग्य संग्रह 'सावधान.......कमज़ोर है' रामपुर रज़ा लाइब्रेरी ने प्रकाशित किया. राजनीति और मीडिया पर इनके लेखों के संग्रह 'शून्यकाल' को अवधप्रभा प्रकाशन,लखनऊ ने प्रकाशित किया.

संपर्क सूत्र :- 'अवधप्रभा', ६१,मयूर रेजिडेंसी, लखनऊ-226016.

कृष्ण गोपाल सिन्हा,

‘अवध प्रभा’, 61, मयूर रेजिडेंसी, फरीदीनगर, लखनऊ -226016,

इमेल - kgsinha2007@rediffmail.com

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