शुक्रवार, 27 मई 2011

मधु संधु की पुस्तक समीक्षा - नारी विमर्श की आंच से दहकता आवां

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आवां कच्‍चे घड़े को पकाने का बृहत्तर उद्देश्‍य लिए रहता है। आवां आंच का, ताप का सहोदर हैं। चित्रा मुद्दगल के अनुसार युवा हृदय में कुछ सपने होते हैं, एक आवां होता है-आंच से दहकता। उपन्‍यास आवां ने 1999 में अपनी बोल्‍डनेस के कारण साहित्‍य जगत में एक जोरदार धमाके के साथ प्रवेश किया और खलबली मचा दी। चर्चा तो ऐसे रही, मानों कामसूत्र का परिष्‍कृत संस्‍करण आया हो। कहानी मुम्‍बई, पूना, खंडाला, हैदराबाद तक-कामगर अघाड़ी से आभूषण दीर्घा-तक फैली है। इसमें ट्रेड यूनियन है, महानगर है, भ्रष्‍ट प्रशासन है, अवसरवादी एवं नकली नेता हैं, भरा-पूरा बाजारवाद है, किन्‍तु इस सबसे बढ़कर इसमें नारी विमर्श/नारीवाद अपने अनेक पहलुओं के साथ आया है।

इक्‍कीस वर्षीय नमिता के पिता के दाहिने अंग को लकवा मार जाता है। मां श्रमजीवा में पापड़ बेलने लगती है, किन्‍तु बड़ी बेटी होने के नाते वह परिवार का सारा उत्तरदायित्‍व सहन करने के लिए दृढ़ संकल्‍प है। वह पढ़ाई छोड़ नौकरी की तलाश में रोजगार दफ्‌तर में नाम लिखवाती है, टाइपिंग सीखती है, फाल लगाती है, पापड़ बेलती है, टयूशनें करती है और फिर आभूषण दीर्घा की चुस्‍त शिकारिन मालकिन अंजना वासवानी के चक्र व्‍यूह में फंस अपने से पंद्रह बीस वर्ष बड़े पत्‍नी प्रपीड़ित संजय कनोई के पास राहत महसूसती है। लगता है मानों खुल जा सिम सिम की तर्ज पर वह निम्‍न वर्ग से अभिजात वर्ग में प्रवेश कर गई है। जबकि सच्‍चाई यह है कि मुम्‍बई शहर में ठरकी प्रौढ़-बूढ़े नादान किशोरियों के शिकार में व्‍यस्‍त हैं।

घर से निकलते ही उसे पता चलता है कि वह मात्रा देह है। वैसे यह बात उसे मौसा ने नौ-दस की उम्र में ही बता दी थी। पिता के मित्रा परम पूज्‍य अन्ना साहब बलात्‍कार नहीं करते, दुराचार/अनाचार करते हैं, क्‍योंकि वह बेटी जैसी है। पवार उससे सच्‍चा प्रेम करता है ? नहीं ! वह तो राजनैतिक भविष्‍य के लिए दलित-ब्राह्‌मण गठबंधन चाहता है। सिद्धार्थ की आंखों में लोलुपता है। मटका किंग अपनी बेटी को ही वासना का भाजन बनाता है और सौतेला भाई गौतमी को। स्‍पष्‍ट है कि औरत के अस्‍तित्‍व का तिलिस्‍म उसकी देह से ही उपजता है।

कुछ अन्‍य प्रश्‍न भी हैं कि क्‍यों परिवारों में अर्थ संकट की मार बेटियों की पढ़ाई पर ही पड़ती है ? क्‍यों कमाने वाली, घर-परिवार का बोझ उठाने वाली बेटियां भी बोझ ही मानी जाती हैं ? क्‍यों रूढ़ रुग्‍ण मानसिकता स्‍त्री की क्षमता को उसकी देह से ऊपर स्‍वीकार नहीं पाती ? क्‍यों पुरुष दिग्‍भ्रमित रहता है कि स्त्री सिर्फ मादा है, कामिनी है ? आवां रेसकोर्स में भाग रही रमणी की कथा है ।

आवां का नारी विमर्श पारम्‍परिक धार्मिक-सांस्‍कृतिक अवधारणाओं का भी अनेक स्‍थलों पर अतिक्रमण करता है। सुनंदा की मृत देह को पहले विमला बेन और फिर सभी स्‍त्रियां कंधा देने का साहस दिखाती हैं। नमिता पिता को मुखाग्‍नि देने की जिद्द करती है। पिता के अस्‍थि विसर्जन एवं पिंडदान के लिए वह नासिक जाती है। उर्मिला पति की बीमारी के कारण मकान/जायदाद अपने नाम करवाने को उतावली है। उसकी उदण्‍ड प्रकृति पति की पातिव्रत्‍य के प्रति अवहेलना की प्रतिक्रिया भी/ही है। सुनंदा पूरे गर्भ के बावजूद सुहेल से विवाह के लिए न धर्म बदलने को तैयार होती है और न नाम। लेस्‍वियन्‍स की बात भी चित्रा ने छेड़ी है।

आवां में हर वय, हर वर्ग की भिन्न समस्‍याओं से घिरी दर्जनों स्‍त्रियां हैं। नमिता, स्‍मिता, स्‍मिता की मां और दीदी, मुनिया, उर्मिला, निर्मला, ममता, कुंती, अंजना, गौतमी और उसकी मां, मारिया, चेतना स्‍वामी, करमकर आंटी, हर्षा, शाह बेन, मनोरमा, श्री वास्‍तव आंटी, विष्‍ठ आंटी, किशोरीबाई, सुनन्‍दा।

सती सावित्री के आदर्श को मानने वाले पुरुष न मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और न बनना चाहते हैं। आवां में प्रश्‍न है कि क्‍या सचमुच औरतें अपनी बंद खोहों से निकल पाएंगी अथवा अपना ही शव ढोती उसी खोह में पलट पड़ेंगी। घिसट-घिसट कर जिएंगी या जिंदगी को अपनी शतोंर् पर मोड़ देंगी।

आवां को पढ़ कर प्रश्‍न उठता है कि चित्राा मुद्दगल क्‍या संदेश देना चाहती है। क्‍या उनका मानना है कि महानगरों में कैरियर की तलाश में निकली हर युवती कमजोर, अपरिपक्‍व एवं असुरक्षित हैं। उसे कभी पिता के मित्रा अन्ना साहब या कभी किसी न किसी सिद्धार्थ/संजय कनोई के अनाचार, बलात्‍कार का शिकार होना ही होना हैं। क्‍या यह पूरा सच है ? कैरियर सजग हर औरत को अपनी देह को सीढ़ियां अवश्‍य बनाना पड़ता है ? आज की औरत कह सकती है कि यह चित्रा मुद्दगल के ज़माने का सच है, पर आवां सिर्फ दस-ग्‍यारह वर्ष पुरानी रचना है। इतनी पुरानी भी नहीं कि भानजी मौसा का अनाचार मां-मौसी से शेयर न कर सके। अन्ना साहब के सिर पर ऐन मौके पर कुर्सी से वार न सके । संजय कनोई की अप्रत्‍याशित मेहरबानियों का कारण न समझ सके। पवार की राजनीति न जान सके। कहीं कहीं लगता है कि चित्रा मुद्दगल भी प्रभा खेतान की तरह दूसरी औरत किशोरीबाई से अतिरिक्‍त सहानुभूति रखे है।

ऐसे ढेरों प्रश्‍न आवें में डाल कर बंद कर दिए हैं चित्रा मुद्दगल ने ।

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