बुधवार, 18 मई 2011

अनन्त आलोक के हाइकु

anant alok ke haiku

1

झरना झरा

दिन रात बहता

पानी ठहरा।

2

जंगल जला

जलता जाये फिर

बारिश खाता।

3

किताबें भरी

पुस्‍तकालयों में

हैं धूल खाती।

4

महंगे ढंग

बदल न सकते

असली रंग।

5

बहुत पौधे

आंगन फुलवारी

सजावट को।

6

निश्‍चित नही

आएगा वापस वो

गया सुबह।

7

मर ही चुका

भीतर का इन्‍सान

आदमी तेरा।

8

रहना जिंदा

जिंदगी में करले

काम जिंदों के।

9

जाता कहां है

फेर कर मुंह को

करके खता।

10

रह जाएगा

स्‍वर्ण खजाना ये

धरा यहीं पे।

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e-mail : anantalok1@gmail.com

Blogs : anantsahitya.blogspot.com

sahityaalok.blogspot.com

1 blogger-facebook:

  1. amita kaundal6:16 pm

    बहुत अच्छे हाइकु हैं बधाई
    किताबें भरी

    पुस्‍तकालयों में

    हैं धूल खाती।



    महंगे ढंग

    बदल न सकते

    असली रंग।

    सादर
    अमिता कौंडल

    उत्तर देंहटाएं

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