अनन्त आलोक के हाइकु

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

anant alok ke haiku

1

झरना झरा

दिन रात बहता

पानी ठहरा।

2

जंगल जला

जलता जाये फिर

बारिश खाता।

3

किताबें भरी

पुस्‍तकालयों में

हैं धूल खाती।

4

महंगे ढंग

बदल न सकते

असली रंग।

5

बहुत पौधे

आंगन फुलवारी

सजावट को।

6

निश्‍चित नही

आएगा वापस वो

गया सुबह।

7

मर ही चुका

भीतर का इन्‍सान

आदमी तेरा।

8

रहना जिंदा

जिंदगी में करले

काम जिंदों के।

9

जाता कहां है

फेर कर मुंह को

करके खता।

10

रह जाएगा

स्‍वर्ण खजाना ये

धरा यहीं पे।

---

e-mail : anantalok1@gmail.com

Blogs : anantsahitya.blogspot.com

sahityaalok.blogspot.com

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

1 टिप्पणी "अनन्त आलोक के हाइकु"

  1. amita kaundal6:16 pm

    बहुत अच्छे हाइकु हैं बधाई
    किताबें भरी

    पुस्‍तकालयों में

    हैं धूल खाती।



    महंगे ढंग

    बदल न सकते

    असली रंग।

    सादर
    अमिता कौंडल

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.