मंगलवार, 3 मई 2011

राम प्रकाश नारंग की कहानी - जिंदगी का तोहफा – जिंदगी के बाद

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(यह कहानी एक सत्य घटना पर आधारित है जिसे मैंने लगभग 30 वर्ष पहले लिखा था. यह कहानी मेरे जीवन की पहली और अंतिम कहानी है.)

कुमार साहिब किसी ज़माने में अपने कार्यालय के सब से कुशल, समझदार, ईमानदार व् कर्मठ कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते थे. परन्तु उम्र व् गृहस्थी की चिंताओं ने उनसे एक एक कर के सारे गुण छीन लिए. पल पल चिंता में डूबते रहने से उनका स्वस्थ्य भी साथ नहीं दे रहा था. रिटायर होने में एक ही साल बचा था . उन्हें एक ही चिंता खाए जा रही थी कि कल क्या होगा . उनकी बेटी की शादी कैसे होगी. न उनके पास अपना मकान रहेगा , न ही कोई अच्छी आय का जरिया क्योंकि ज़वान बेटा भी तो अभी नौकरी की तलाश में धक्के खा रहा था. एक क्लार्क के मुट्ठी भर वेतन से घर कैसे चले गा. कुमार साहिब की सुबह इसी सोच से शुरू होती थी और रात बिस्तर पर लेटने के बाद तक यही प्रश्न उन्हें घेरे रहते थे. कहीं भी किसी भी काम में ध्यान नहीं लगता था. दफ्तर में रोज देर से पहुँचते , रोजाना कोई न कोई गलती हो जाती और ऑफिसर की फटकार सुनने को मिलती. सर झुकाए, नम आँखों से चुप चाप सब सुन लेते पर कोई उत्तर देते न बनता. सभी मित्र व् सहकर्मी भी उनकी इस हालत से अच्छी तरह परिचित थे और हर तरह से उनकी सहायता भी करते. परन्तु फिर भी ऑफिसर तो आखिर ऑफिसर ही है. सरकारी नौकरी तो है परन्तु उसका यह मतलब भी तो नहीं की आप कुछ भी कर लें आपकी नौकरी पर आंच नहीं आये गी .

उस दिन दफ्तर में एक छोटी सी भूल के कारण एक बहुत बड़ा नुक्सान हो गया . ऑफिसर ने आखिर तंग आ कर उन्हें अपने कमरे में बुलाया और कहा “आप की उम्र हो चली है. अब आप किसी ज़िम्मेदारी लेने के काबिल नहीं रहे. न जाने दिन रात आप क्या सोचते रहते हैं . काम में आपका मन अब बिलकुल नहीं लग रहा . देर से आते हैं और समय से पहले निकल जाते हैं. अच्छा होगा अब आप घर पर ही आराम करें. में आज ही आपका केस ऊपर भेज रहा हूँ ताकि आपको ज़ल्दी से ज़ल्दी रिटायर कर दिया जाए.” इन शब्दों से मानो उनके कानों में पिघला हुआ शीशा डाल दिया. वह कुछ समझ नहीं पा रहे थे . कांपते होठों को थोड़ी सी ताकत दे कर उन्होंने हाथ जोड़ कर ऑफिसर से माफ़ी मांगी और कहा “ सर , भूल हो गई . आगे से ध्यान रखूँगा. इस बार क्षमाँ कर दो . में कुछ व्यक्तिगत कारणों से परेशां हूँ इसीलिए काम में मन नहीं लग रहा. मैं कोशिश .........” अभी उनकी बात पूरी भी न हुई थी की ऑफिसर ने गुस्से से कहा “ आप जा सकते हैं और हाँ शर्मा जी को भेज दीजिये मैं आपका काम उन्हें सौंप दूंगा. घर बैठ के आर्डर का इंतज़ार कीजिये.......” कुमार साहिब का सारा बदन काँप गया . उन्होंने अपने आप को संभाला और दीवार का सहारा ले के एक बार उन्होंने अपने ऑफिसर को देखा और टूटी बिखरी भाषा में बोले “ सर.....मेरी बेटी की शादी........मेरे बेटे की नौकरी......मेरा मकान......” और अपनी बात को बिना पूरा किये ही बेहोश होके वहीँ गिर पड़े. उनके ऑफिसर ने व् दूसरे मित्रों ने उन्हें संभाला और अस्पताल पहुँचाया. कुछ दिन अस्पताल रहने के बाद कुमार साहिब आज ही घर वापिस आये थे. सूनी निगाहों से कभी अपने उस सरकारी मकान को देखते जो रिटायरमेंट के बाद छीन लिया जाए गा, कभी अपने बेटे की ओर देखते जो नौकरी की तलाश में आज भी न जाने कहाँ कहाँ की ख़ाक छान के आया था, कभी भीगी पलकों से उस बेटी को झांकते जिस के हाथों में शायद मेहंदी कभी भी न लग पाए गी. कुमार साहिब की पत्नी उनका हाथ थामे उन्हें ढाढस बंधा रही थी. घर पर मानो मातम छा गया .

सारी रात अपनी पत्नी से अपने दुख बांटते रहे. आँखों से नींद ओझल हो चुकी थी. एक ही बात को बार बार दोहराए जा रहे थे “क्या होगा इस परिवार का ...... भगवान ने यह सारे दुख हमारे ही नाम क्यों लिख दिए....... एक सहारा था नौकरी का वो भी चला गया . कैसे चले गा गुज़ारा.......” और न जाने क्या क्या. उनकी पत्नी ने उन्हें प्यार से पुचकारते हुए कहा “ भगवान पर भरोसा रखो . वहां देर है अंधेर नहीं .....हो सकता है भगवान हमारी परीक्षा ले रहा है .... हौसला रखिये सब ठीक हो जाए गा...” और धीरे धीरे कुमार साहिब ने आँखें बंद करते हुए कहा “ हो सकता है तुम ठीक कह रही हो ..... पर हम पर तकदीर इतनी मेहरबान नहीं की सब कुछ ठीक हो जाए गा. फिर भी उस की लीला वो ही जाने .... न जाने क्या रच रखा है हमारे लिए....” कहते कहते कुमार साहिब खामोश हो गए और आँखें मूँद ली.

सुबह सब उठे परन्तु कुमार साहिब नहीं उठे. चिंतित पत्नी ने झट डाक्टर को बुलवाया परन्तु उसका आना तो केवल एक औपचारिकता भर थी क्योंकि डाक्टर साहिब ने बताया कि कुमार साहिब तो रात में ही दिल के दौरे से चल बसे थे ......वो रात उनकी आखिरी रात थी. चिंता ने कुमार साहिब की चिता ही सजा दी.....सारा घर मातम में डूब गया. पड़ोसी, मित्र व् सहकर्मी सभी इस शोक की घड़ी में कुमार साहिब के घर पहुंचे. उनकी अंतिम यात्रा में सभी दबी हुई आवाज़ में एक ही बात कर रहे थे की चिंता से बड़ी कोई बीमारी नहीं. इसी ने उनकी जान ले ली.

कुछ दिन यूं ही शोक में डूबा परिवार अपने काले भविष्य का सामना करने के लिए हिम्मत जुटाता रहा कि अचानक एक रोज़ दफ्तर से कुमार साहिब के सहयोगी कपूर साहिब आये. शोकाकुल व् दुखी मन से उन्होंने परिवार को सान्तवना दी और कहा कि इश्वर की इच्छा के आगे हम सब विवश हैं. हम तो केवल उनसे प्रार्थना कर सकते हैं और वे सबकी सुनते भी हैं और सब के दुख भी हरते हैं . परिवार के सभी लोग उनकी इन बातों को चुपचाप सर झुकाए सुन रहे थे क्योंकि यही वो शब्द थे जो पिछले कई दिनों से दोहराए जा रहे थे . जो भी आता इसी तरह के शब्द बोल के अपनी वेदना प्रकट करता. लेकिन आज कपूर साहिब के शब्दों का अर्थ कुछ और ही था. वे तो वास्तव में इस परिवार के लिए प्रभु का आशीर्वाद ले के आये थे. उन्होंने एक लिफाफा मिसिज़ कुमार के हाथ में दिया और कहा कि इसमें कुछ पैसे है जो सोसायटी की तरफ से भेजे गए हैं. उन्होंने यह भी बताया कि नियमों के अनुसार कुमार साहिब की मृत्यु के पश्चात उनके बेटे को सरकारी नौकरी दी जा सकती है. यदि वह चाहे तो अर्जी दे सकता है. यदि उसे नौकरी पर रख लिया गया तो नियमानुसार यह मकान भी उसी के नाम हो सकता है जिसे वे अपने कार्यकाल तक अपने पास रख सकते हैं. इतना सुनते ही परिवार के सभी लोगों के चेहरे पर एक खुशी की लहर दौड़ गई. मिसिज़ कुमार ने हाथ जोड़ कर भगवान का लाख लाख शुक्र अदा किया कि उन्हें भी जीने का एक सहारा मिल गया. बेटे की आँखों से भी आंसू छलक आये . उसने अपने आंसुओं को पोंछ्ते हुए कपूर साहिब से पूछा “अंकल , ऐसा भी होता है कि जिंदगी भर जिसे पाने के लिए आदमी तरस्ता रहता है वह चीज़ उसे मृत्यु उपहार के रूप में दे सकती है.” और वह कपूर साहिब के गोद में सर रख कर बिलख बिलख कर रोने लगा. शायद हमारी सभी समस्याओं का एक ही समाधान था – पिता जी की मौत.

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राम प्रकाश नारंग

15, अरावली अपार्टमेंट,

अलकनंदा, नई दिल्ली

1 blogger-facebook:

  1. sushma sarna9:11 pm

    uncle well written yehi ajj ki sachai hai per hume sanghash kerte rehna hai for the betterment of our children

    उत्तर देंहटाएं

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