मंगलवार, 3 मई 2011

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - लू में कवि

तेज गरमी है। लू चल रही है। धूप की तरफ देखने मात्र से बुखार जैसा लगता है। बारिश दूर दूर तक नहीं है। बिजली बन्‍द है। पानी आया नहीं है, ऐसे में कवि स्‍नान-ध्‍यान भी नहीं कर पाया है। लू में कविता भी नहीं हो सकती, ऐसे में कवि क्‍या कर सकता है। कवि कविता में असफल हो कर प्रेम कर सकता है, मगर खाप पंचायतों के डर से कवि प्रेम भी नहीं कर पाता। कवि डरपोक है मगर कवि प्रिया डरपोक नहीं है, वह गरमी की दोपहर में पंखा लेकर अवतरित होती है, कवि की गरमी कम हो जाती है। वापस चारपाई पर गिर कर छत को देखने लग जाता है। तेज गरमी में उसका मन होता है कि बिजली विभाग को गालियां दे, मगर बिजली वालों पर कोई असर नहीं होता। नलों में भी पानी नहीं है। वह नहा भी नही सकता। बिन नहाये कविता भी नहीं हो सकती। कवि कविता की धौंस सरकार को देता है, मगर सरकार कवि कि धौंस पट्‌टी में नहीं आती। सरकार सीधे सम्‍पादक से बात करती है और कवि को एक तरफ सरका देती है।कवि तेज लू के थपेड़ों में पड़ा पड़ा चिन्‍तन करता है वह नल की तरह सूं सूं करने लग जाता है। उसे बिजली की याद फिर आती है, कवि मन मसोसता है। लू फिर चल रही है। बाहर अमलतास के पीले फूल खिल रहे है।

कवि खिड़की से उदास निगाहों से अमलतास को देखता है। बिना नहाये ही अमलतास के पुष्प-गुच्‍छ कवि को बहुत अच्‍छे लग रहे है, कवि उदास है बिजली नहीं है, पानी नहीं है मगर अमलतास खिल रहा है, कवि भावुक हो गया है। कविप्रिया कच्‍ची कैरी, आम, खरबूज, लीची, फालसे, ठण्‍डाई की चर्चा छेड़ती है, गरमी कुछ कम होती है, मगर बिजली बन्‍द हे, कवि को गांव के पनघट की याद आती है। कवि परेशान होने लगा। काश कविप्रिया के स्‍थान पर बिजली, विद्युत, इलेक्‍ट्रॉन तरंगें आ जाती। कवि पहाड़ों पर जाना चाहता था मगर कविता की जुगाली से कुछ नहीं मिलता। कवि विद्युत चिन्‍तन जारी रखता है। कवि अखबार से हवा करने लगा। अखबार में समाचारों की हवा पहले से ही निकली हुई है। पुराने बलात्‍कारों, घोटालों, घपलों, भ्रष्टाचारों के ताजा समाचारों से कविता नहीं बनती। नेता एक दूसरे को निष्ठावान बता रहे है, और गरमी में ए․सी․ में बैठ कर अपनी अपनी तोंद पर हाथ फेर रहे है। कवि गरमी में फिर उदास हो जाता है। कवि का मटका खाली है। कवि ने सपने देखना शुरु कर दिया है। सपने में कवि ने देखा बिजली आ गई है, नल में पानी भी है कवि रगड़-रगड़ कर नहाया। ताजा हो गया मगर सपना टूटते क्‍या देर लगती है। बाहर लू और भी तेज हो गई है, बेचारा कवि कविता छोड़ कर व्‍यंग्‍य की शरण में आ जाता है वो सरकार के खिलाफ एक धारदार, तेज तर्रार सम्‍पादकीय लिख मारता है जो पाठकों के पत्र कालम में अवतरित होता है, मगर लू का कहर जारी है। अब कवि क्‍या करें।

000

यशवन्‍त कोठारी,

86, लक्ष्‍मी नगर,

ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर - 2,

फोन - 2670596

e-mail ID - ykkothari3@gmail़com

m--09414461207

2 blogger-facebook:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (5-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्रेम माथुर की ईमेल से प्राप्त टिप्पणी -
    yashvant kothariji ka vyang padha! maza aaya - wah!!! BUT:
    अफ़सोस है

    कवि वाह वाह से खुश होता रहता है
    पर व्यंग से सरकारें बदलती नहीं
    अफ़सोस है

    मोटी चमड़ी वाले बातों से सुधरते नहीं
    गुंडों से घिरे हैं लातों से समझा सकते नहीं
    अफ़सोस है

    करें मुकाबला सरे आम, चुनाव में
    भले लोगों में आजकल हिम्मत नहीं
    अफ़सोस है

    अब चाहिए कोई गाँधी, कोई नेहरु, पटेल
    अवतार भगवान का अब आने वाला नहीं
    अफ़सोस है

    मेरी बात पर शायद करेगा कोई वाह वाह
    पर 'हाय-हाय' 'वाह-वाह' से काम चलता नहीं
    अफ़सोस है

    'फकीर अजमेरी'
    (Prem Mathur)
    (c) Prem S Mathur
    8 Lachlan Rd, Willetton
    WA 6155
    Australia

    उत्तर देंहटाएं

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