शनिवार, 21 मई 2011

कृष्‍ण गोपाल सिन्‍हा की कविताएँ - तुम्‍हारे बनाये तटबन्‍धों में बहना चाहता हूं

आओ एक छन्‍द रचें

आओ हम दोनों मिलकर

एक गीत लिखें, एक छन्‍द रचें ।

इस गीत के भाव तुम्‍हारे हो, शब्‍द मेरे हों

अर्थ हम दोनो के हों ।

इस गीत में पंक्‍तियां हम दोनो हों,

रस और अलंकार तुम्‍हारे हो,

शीर्षक तुम कहो तो मै दे दूं ।

हम दोनो ही मिलकर

इस गीत को , इस छंद को

लिखें भी, गाये भी, गुनगुनाये भी ।

स्‍वर मेरा हो तो लय तुम्‍हारा हो,

लय मेरा हो तो स्‍वर तुम्‍हारा हो ।

गजल हो तो रदीफ तुम

और काफिया मैं रहूं,

हर पक्‍ति में कर्त्‍ता तुम क्रिया मैं रहूं

और फल हम दोनो हों ।

आओ हम दोनो मिलकर

एक गीत लिखे, एक छन्‍द रचें ।

 

तुम्‍हारे बनाये तटबन्‍धों में बहना चाहता हूं

मै थमना नही चाहता, जमना नही चाहता,

गति चाहता हूँ प्रवाह चाहता हूँ, तरंग चाहता हूँ

इसीलिए बहना चाहता हूँ।

बहने के लिये मुझे दो किनारे चाहिये

तुम्‍हारे बनाये गये किनारों में, तटबन्‍धों में,

सिमटना और बहना चाहता हूं ।

क्‍या तुम मेरे लिये दो किनारे बन सकोगे

जिनके बाहर मै नही जाना चाहूंगा ।

तुम्‍हारे बनाये तटबन्‍ध मुझे बांधकर रखेंगे

मै उन्‍हे कभी नहीं तोड़ूंगा, वचन देता हूं ।

तुम्‍हारे बनाये तटबन्‍धों को तोड़ना नहीं

मै सिर्फ उनमें बहना चाहूंगा ।

जब ऐसे तटबन्‍ध बना लेना

तो मुझे उनमें समा लेना।

मैं जानता हूँ वह प्रवाह कभी नहीं थमेगा

शान्‍त और शीतल बहता रहेगा ।

मुझे तुम्‍हारे बनाये तटबन्‍ध चाहिये

बाहों का हो, अधरों का हो,

पलकों का हो या और कोई और

जैसा तुम चाहो ।

---

 

कृष्‍ण गोपाल सिन्‍हा,

अवध प्रभा' 61, मयूर रेजीडेन्‍सी,

फरीदी नगर, लखनऊ-226016.

2 blogger-facebook:

  1. बेहतरीन अभिव्यक्ति , बधाई सिन्हा जी।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अमिता कौंडल1:09 am

    बहुत सुंदर शब्द रचना है बधाई

    सादर
    अमिता कौंडल

    उत्तर देंहटाएं

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