गुरुवार, 12 मई 2011

डंडा लखनवी के दो व्यंग्य

जनसेवा की शपथ

अपने यहाँ मिल्‍क-बार नहीं हैं तो न सही। बार तो हैं। उनके न होने से कौन सा पहाड़ टूटा जा रहा है। रही सेहत की बात तो उसके लिए योजनाकारों ने जगह-जगह विदेशी शराब के ठेके खुलवा ही दिए हैं। दारू का जायका बढ़ाने के लिए मछली-मुर्गा की फामिंर्ग चल ही रही हैं। रह गया सुअर उसकी महानता के कहने ही क्‍या जब देववाणी संस्‍कृत वाले उसे बाराह कहते हैं तो जनवाणी हिंदी वालों की क्‍या बिसात कि वे उसे बे-राह कह सकें।

वैज्ञानिकों ने तो बारहों में अनेक खूबियाँ ढूंढ निकाली हैं। उनका कथन है-बाराह गंदी जगहों पर रहते हैं। अपने पांडे का अपना बाराह-पुराण है। वे कहते पूछते हैं कि गंदगी कहाँ नहीं है? उदाहरण रूप में राजनीति को ही लेलें। वहाँ कौन स्‍वच्‍छता के झंडे फहर रहे हैं। रहने वाले वहाँ भी रह लेते हैं। बाराहों के व्‍यवहार-विज्ञान पर वैज्ञानिकों का विचार है-वे राह चलते-चलते पलटा मार जाते हैं। उनकी इस हरकत से असावधान लोग चोट खा जाते है।पांड़े कहते हैं-राजनीति के बाराह तो रोज ही पलटा मारते रहते हैं। कब किस बात को कह कर पलट जाँय इसे कौन जानता है।' वैज्ञानिकों के अनुसार बाराह के बाल सीधे और सख्‍त होते हैं। उन्‍हें मनचाहे आकार में मोड़ना आसान नहीं होता।'' पांड़े का दावा है-राजनीति के बाराहों के बाल कौन बड़े मुलायम होते हैं।' वैज्ञानिकों का मत है-बाराह की त्‍वचा में चर्बी की मोटी-मोटी परतें होती हैं। पांड़े प्रश्‍न करते हैं-राजनीति के बाराहों के गर्वीले और चर्बीलेपन पर क्‍या किसी को संदेह है?'

वैज्ञानिक कहते हैं-बाराह गंदगी पसंद होते हैं। वे एक-दूसरे पर खूब कीचड़ उछालते हैं।' पांड़े का कहते हैं-राजनीति के बारहों का स्‍वभाव भी तो ऐसा होता है। उन्‍हें एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते और थूकते हुए किसने नहीं देखा।' पशु-विज्ञान में हुए नए शोधों से यह तथ्‍य प्रकाश में आया हैं कि बाराहों के शरीर में दो प्रकार के वायरस पलते हैं। एक से मलेरिया और दूसरे से इंसेफेलाइटिस फैलता है। पांडे़ को इसमें भी अद्‌भुत समानता दिखी है। उनका कथन है कि राजनीति के बाराहों पर भी दो प्रकार के वायरस पलते हैं। एक से धर्मवाद के और दूसरे जातिवाद के वायरस फैलाते हैं।

कई शहरों में इंसेफेलाइटिस के वायरस आजकल डिस्‍को-डांस कर रहे हैं। उनकी घीगा-मस्‍ती और उधम-चौकड़ी से सैकड़ों नौनिहालों के प्राण-पखेरू उड़ चुके हैं। संसार भर में अपनी थू-थू कराने वाले उग्रवादी संगठन अलकायदा की भी एक नीति है। वह जब कोई वारदात करता है तो अल- जजीरा नामक टी0वी0 चौनल के माध्‍यम से अपनी जिम्‍मेदारी को कबूल कर लेता है। एक राजनीति के बाराह-गण ठहरे। सैकड़ों बच्‍चों के मौत के मुंह में चले जाने के बाद जिम्‍मेदारी लेने के लिए आगे नहीं आते हैं। पाडे़ कहते हैं-वे कोई उग्रवादी थोड़े हैं; न उन्‍हें पागल कुत्ते ने काटा है। आगे आएं जिम्‍मेदारी लें और इस्तीफा दें।'

आजकल सार्वजनिक संस्‍थाएं विविध प्रकार के वायरसों की गेस्‍ट-हाऊस बन कर रह गई हैं। ढ़ीठ वायरस उनमें शरणार्थियों की तरह आते हैं और बाप की प्रापर्टी समझ कर काबिज हो जाते हैं। वे डाक्‍टरों से नहीं डरते हैं अपितु डाक्‍टर लोग उनसे दूर भागते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के वायरस कुछ ज्‍यादा ही लग्‍गड़ हैं। इसलिए समझदार चिकित्‍सक वहाँ जाने से सदैव बचते हैं। वे न वहाँ जाएंगे और न ही वहाँ के वायरसों से उनका आमना सामना होगा।

धवलता डाक्‍टरों के चरित्र और वस्‍त्रों से टपकती है। उनकी उज्‍ज्‍वलता पर प्राइवेट प्रैक्‍टिस का आरोप लगाना सरासर अन्‍याय है। जाँच होगी तो आरोपी अपना सिर पीटते रह जाएंगे देख लेना। चिकित्‍सकों की बेल होगी; जेल नहीं। ऐसे उज्‍ज्‍वल चिकित्‍सकों के रहते हुए कोई कैसे कह सकता है कि इंसेफेलाइटिस की मार से रामभरोसे अस्‍पताल में कराहता होगा। राजनैतिक बाराहों के वस्‍त्रों में तो वैसे भी बड़ा टिनोपाल रहता है। उन पर किसी प्रकार आरोप लगाना सूरज के मुख पर थूकना है। इसके लिए ये लोग हरगिज जिम्‍मेदार नहीं हैं। जनसेवा की सच्‍ची शपथ लेने का चलन राजनीति में भी है और सच्‍ची ओथ भगवान की डुप्‍लीकेट कहे जाने वाले चिकित्‍सा भी लेते हैं।

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ईमानदारी की सेल

आज हर तरफ अन्‍ना-अन्‍ना हो रहा है। मेरा इस शब्‍द से बड़ा लगाव रहा है। बचपन में अधन्‍ना से परिचय हुआ। पॉकेटमनी के रूप में पिता जी दिया करते थे। तबके बालक अधन्‍ना पा कर प्रसन्‍ना-प्रसन्‍ना रहते थे।

आगे चल कर प्रसन्‍ना नाम कानों में गूँजने लगा। इसमें भी अन्‍ना की अनुगूँज है। क्रिकेट मैच आज की तरह पहले भी होते थे किन्‍तु तबके मैच प्रायः कानों से देखे जाते थे। आँखों से मैच देखने का तब चलन नहीं था। जैसे ही कोई विकेट चटकता लोग ताली बजा कर झूमने लगते। ताली बजाने के चक्‍कर में लोगों के ट्राजिस्‍टर हाथ से छूट जाते थे। फिर भी उनके मुख से बरबस निकल पड़ता था- वाह प्रसन्‍ना! वाह प्रसन्‍ना! प्रसन्‍ना और अन्‍ना में विचित्र समानता है। वे क्रिकेट के विकेट चिटकाते थे और ये भष्‍टाचारियों के विकेट।

जंतर-मंतर को कोप-स्‍थल बनाने वाले अन्‍ना पर आजकल मीडिया का बड़ा फोकस है। वे हजार अन्‍ना में एक हैं। उनका अन्‍ना हजारे नाम वैसे ही नहीं पड़ा है। धवलता मात्र इनके वस्‍त्रों में नहीं, चरित्र में झलकती है। इनके पास उपवास नामक शक्तिशाली हथियार है। इसके प्रयोग करते ही प्रशासनिक हलके में सुनामी आ जाती है। अपने हथियार का परिक्षण ये प्रायः करते रहते हैं। भ्रष्‍ट-कुर्सी हिलाना इनका पसंदीदा शौक है।

हमारे यहाँ राज्‍यपाल, सींचपाल, लेखपाल पहले से हैं। सब के सब अपनी-अपनी तरह से भ्रष्‍टाचार को उखाड़ते हैं। अब लोकपाल बिल बनने जा रहा है। कुछ लोग इस बात से खुश हैं कि बिल बनवाने का ठेका अन्‍ना के पास है। माना लोकपाल बिल बन गया। चरित्र के बिना फिर समस्‍या आएगी। दूध का धुला लोकपाल कहाँ से लाओगे और उसे बहती गंगा में हाथ धोने से कौन रोकेगा?

मनुष्‍य नामक जीव की पशुता दूर करने के लिए पाठशालाएं, कोतवालियाँ, अदालतें तथा जेलें हैं। पूजाघरों की देश भर में कमी नहीं है। टी॰वी॰ चौनलों पर उपदेशकों की भरमार है। सभी बेचौन हैं आदमी को चरित्रवान बनाने में। फिर भी ढ़ाक के तीन पात। हर तरफ कुत्त्ो की दुम टेढ़ी की टेढ़ी है। भ्रष्‍टाचार का ग्राफ आसमान चढ़ा जा रहा है। पता लगाइए! कहीं जिन एजेंसियों के कंधों पर मानवीय चरित्र को सवाँरने का दायित्‍व है वे ईमानदारी की सेल कम होने कारण अपना धंधा तो नहीं बदल चुकीं हैं।

2 blogger-facebook:

  1. बहुत ही सटीक व्यंग हैं....कमाल के....

    उत्तर देंहटाएं
  2. Dr.G.P.Sharma8:26 am

    डंडा लखनवी के दोनों वयंग्य धारदार हैं । लेखक और 'रचनाकार' दोनों को बधाई।
    डाक्टर गंगा प्रसाद शर्मा

    उत्तर देंहटाएं

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