गुरुवार, 12 मई 2011

पुरूषोत्तम व्यास की कविताएँ

चंद्रमा की कविता

चंद्रमा की कविता

चंद्रमा की कविता में

चाँदनी का अनुराग अपार

पिघलते हुये हिमशिखर

चमक रहा किरणों का हार

अधरों पर मुस्कान

नयनों की जलधि छू रही पलकों को

टेढ़ा सा पथ-

चल रहा सरल सा-

उसकी छाँव ने स्वप्न देखे हजार,

सुकोमल से ह्दय पर छालों के निशान अपार

निशा

टिम-टिमा रहे तारे हजार ........।

 

पीड़ा

पीड़ा में कहराते पाया,

नयनों से आंसुओं का झरना बहता पाया ,

रोके नहीं रूक रही,

पीड़ा ह्दय की नयनों से बही पड़ी,

बीच चौराहे में जैसे ज्वालामुखी फूटता पाया ।

पीड़ा-उसको क्या थी,

उसे-मालूम थी,

पीड़ा में तो शिलाओं को पिघलता पाया ।

मैं-असहाय-सा कुछ न कर पाया,

प्रभु-से इतनी प्रार्थना कर पाया,

प्रभु-उसकी पीड़ा कम कर देना ।

--

ई-मेल  pur_vyas007@yahoo.com

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