सोमवार, 9 मई 2011

कृष्ण गोपाल सिह्ना का व्यंग्य - सब नशे में हैं



                                         



    बयासी साल पहले केशव प्रसाद जी के पांवों को पालने में देखने वालों को इस बात का भरोसा हो गया था कि जिन पैरों को वे देख रहे थे वे न तो कभी डगमगाने वाले थे न ही लड़खड़ाने वाले। केशव जी के पांवों को पालने में देखने वाले तो नहींंंं रहे पर आज स्वयं केशव प्रसाद जी को इस बात का गुमान जरूर है कि इन पांवों ने तो कभी बहकने की जुर्रत की न ही कभी डगमगाये। उन्हें इस बात को लेकर भी फ़ख्र है कि उनके पांवों ने कभी भी ऊॅचा-नीचा पड़ने की गलती नहींंंं की। घर वालों का भरोसा सवां-सोलह आने खरा उतरा। आज भी उनके पांवों में भरपूर दम-खम है। भगवान करे उन्हींंंं की तरह सभी के पांवों में भरपूर दमखम हो, लड़खड़ाने, बहकने, डगमगाने और फिसलने की नौबत कभी न आये।

    ऐसे ही नेक विचारों से सराबोर कल मुझे दारूलसफा से सक्सेना जी आते दिखाई दिये। दरअसल, सक्सेना जी को देखने में सबसे अहम बात यह थी कि मेरी नज़र उनकी लड़खड़ाती चाल और डगमंगाती पैरों पर पड़ी। लेंस के भरोसे अपनी निगाह पर मुझे भरोसा था इसलिए उनके पैरों के लड़खड़ाने की बात सौ-फीसदी पक्की थी। इससे पहले भी कई बार उनके लड़खड़ाने को अपनी इन्हींंंं दुरूस्त नज़रों से मैने देखा। इस बार भी पास पहुंचते-पहुंचते पिछली कई बार की तरह पैरों की लड़खड़ाहट के साथ जुबान की बड़बड़ाहट को युगलबन्दी करते पाया। कभी-कभार तो ऐसा भी संयोग हुआ जब सक्सेना जी के साथ-साथ उनके दो-चार समानधर्मी और समानकर्मी को बड़बड़ाहट और लड़खड़ाहट का कोरस करते पा चुका था। ऐसे जितने भी मौके आये मुझे यह देखने और समझने का सौभाग्य प्राप्त हुआ कि पैरों की लड़खड़ाहट का साथ जुबान की लड़खड़ाहट भी बखूवी निभाते हैं।

    कल से पहले भी ऐसा कई बार हुआ इसलिए मुझे सक्सेना जी के बारे में कुछ भी अजब या गजब महसूस नहींंं हुआ। लेकिन इस दौरान मुझे दो-चार-छः लोगों की जानकारी जरूर मिली जो किसी न किसी तरह के तलब के गिरफ्त में हैं। इस प्रकार की जानकारी के लिए मेरे सूत्र भटनागर जी है जो सक्सेना जी के पड़ोस में रहते हैं। मैं भटनागर जी को एक भरोसेमंद सूत्र इसलिए मानता हॅू क्योंकि वे सब कुछ के बावजूद पूरी तरह ‘कन्ट्रोल’ में रहते हैं। खुद को किसी तलब के कन्ट्रोल में सरेन्डर करके भी अपने चाल-ढाल और बोल-चाल की स्थिति नियंत्रण में रखने वाले भटनागर साहब नशे और नशाखोरी को लेकर चर्चा करने में बड़ा रस लेते हैं। मुझे बहुत अच्छा लगता है जब वे कहते हैं कि जब नशीली चीजों की आवा-जाही, खरीद- फरोख्त पर हम काबू नहींंं रख पाते तो नशे पर कैसे कोई काबू कर सकता है। उनका यह पक्का यकीन है कि ऐसे में कोई अक्ल और शक्ल पर भी काबू नहींंं रख पाता है तो इसमें अनहोनी कैसी।

    भटनागर जी की इन्हींंंं धारणाओं को लेकर कुछ हस्तियों का स्मरण करने को मैं मजबूर हुआ हूं। देवदास इस टापटेन में सबसे ऊपर आसानी से फिट हो गये है। मीना, मनीषा, रेखा, बरखा के अलावा एक-दो शायरों, दो-चार कवियों, चार-छः नेताओं और  आठ-दस अधिकारियों में से 9 लोगों का स्थान और तय करना चाहता हूं जिसे मैं नहींंं कर पा रहा हूं। रास्ता निकाला है, लोगों के एसएमएस से इस बात का फैसला करने की सोच कर मैं इस मुद्दे को यही ड्राप करता हूं।

    मुद्दे को ड्राप करते ही मेरे जहन मेंे मेरे और भटनागर जी के कामन पड़ोसी प्रसाद जी आ धमके हैं। सौभाग्य से उन्हें भी ऐसे मामलों की अच्छी जानकारी रहती है। सो ऐसी कोई बात छिड़ी तो कहने लगे-‘नशाखोरी को लेकर हमारा परेशान होना तो जायज है पर और ‘खोरियों’ का क्या होगा’? उन्हें जब मेरी ओर से कोई उत्तर नसीब नहींंं हुआ तो खुद बताने लगे कि जमाखोरी, सूदखोरी, रिश्वतखोरी और भी एक-आध दूसरी ‘खोरी’ भी तो है जिसके लिए न तो कोई समय होता है न कोई स्थान तय है। अरे पहले वाले में कम से कम शाम को लेने और सुबह तौबा करने की एक रवायत तो निभाई जाती है। पी0एम0 की जगह ए0एम0 का लेबल तो कहीं नहींंं होता।

    प्रसाद जी का कान्सेप्ट मुझे बड़ा ही स्पष्ट और बुनियादी लगता है। उनका एक कान्सेप्ट और गुस्सा भी उन लोगों को लेकर है जो बिना कुछ खाये-पीये (सेवन किये) भी नशे में चूर रहते हैं। बकौल प्रसाद जी कुछ को धन का, कईयों को पद का, अनेकों को ‘पावर’ का और अधिकतर को बिरादरी का नशा छाया रहता है। नशे में कौन है कौन नहींंं है का फर्क करना भी बेमानी लगने लगा है। गोया सभी नशे में है, प्रसाद जी की इस स्थिति में अटूट आस्था है।

    प्रसाद जी का एक अप्रोच इस विषय में कुछ लिबरल और प्रैक्टीकल लगने वाला है। सुविधा-असुविधा के बारे में वे मानते हैं कि मस्ती जब सस्ती है तो लोगों को आसानी होती है। आसानी और बढ़ जाती है जब ‘‘आवास से डेढ़ किलोमीटर के अन्दर मतदान केन्द्र की व्यवस्था’’ के तर्ज पर मस्ती की उपलब्धता का ठेका सरकार खुद ले दे लेती है। आखिरकार, सरकार की भी ड्यूटी है कि जनसुविधाओं का पूरा-पूरा ध्यान दिया जाये तो फिर ड्यूटी पर होने न होने से इस मस्ती पर क्या फर्क पड़ने वाला होता है।

    प्रसाद जी सक्सेना जी वाले पैरों की लड़खड़ाहट को पूरी तरह समझते हैं। लेकिन उन्हें चिन्ता उन लड़खड़ाहटों को लेकर रहती है जिनका लेना-देना उमर के तकाजों के तौर पर होता है। किसी भी तरह की कमजोरी न होने के बावजूद जो लोग अपने पैरोंे में कमजोरी महसूस करते हैं उनकी दुनिया अलग होती है- फांकामस्ती की दुनिया, हालमस्ती की दुनिया, मालमस्ती नहींंं नसीब हुई तो क्या हुआ।

               ’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

कृष्ण गोपाल सिन्हा,

‘‘अवध प्रभा’’

61, मयूर रेजीडेन्सी,

फरीदी नगर,

लखनऊ-226016.

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  1. व्यंग्य उस पर्दे को हटा देता है जिसके पीछे अंध-विशवास पनपता है। अपना प्रयास जारी रखिए। शुभकामनाएं ।

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