बुधवार, 18 मई 2011

अमिता कौंडल की कविता - हाय ये बचपन कैसा रे?

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हाय  ये बचपन कैसा रे?

हाय  ये बचपन कैसा रे?
माँ के आँचल से दूर है
ढूंढें कचरे में कौर है
हाय  ये बचपन कैसा रे?
हाथ में कलम दवात नहीं
बदन पर कपडा साफ  नहीं
सिर पर ममता का हाथ नहीं
हाय ये बचपन कैसा रे..........

रहने को इक मकान नहीं
खेलने का  सामान नहीं
सोने को फूटपाथ यही
हाय ये बचपन कैसा रे............

ये बचपन  हर पल  रोता है
मुझको तो  पीड़ा देता है
क्या  तुझको दर्द न होता है?
मेरा तेरा अच्छा बीता 
तो ये क्यूँ बोझा ढ़ोता है
हाय ये बचपन कैसा रे...........

क्या ये भी खिलखिलायेगा
भर पेट भोजन खायेगा  
तेरे मेरे बच्चों जैसा
क्या ये भी पढने जायेगा
क्यों ये बचपन है ऐसा रे...

3 blogger-facebook:

  1. बचपन के लिए अमिता की चिन्ता ज़ायज है । आपने बहुत ही मार्मिक शब्दों में इस समस्या को प्रस्तुत किया है ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. क्या ये भी खिलखिलायेगा
    भर पेट भोजन खायेगा
    तेरे मेरे बच्चों जैसा
    क्या ये भी पढने जायेगा
    क्यों ये बचपन है ऐसा रे...
    kash aesa ho
    amita ji kya baat hai apna darad to sabhi likhte hain pr kavita vahi hai jo dusron ke liye likhi jaye ayr sabhi usse jud saken .
    aapki kavita aesi hi hai
    aap hamesha samajik chetna jagati hui kavita likhti hain .
    bahut bahut badhai
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  3. amita kaundal9:18 am

    कम्बोज भाईसाहब व् रचना जी आप दोनों के स्नेह शब्दों के किये हार्दिक धन्यवाद l आशा है आप दोनों का स्नेह और प्रोत्साहन यूँही मिलता रहेगाl
    सादर
    अमिता

    उत्तर देंहटाएं

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